विश्वविद्यालय शिक्षक चयन आयोग के गठन की है जरूरत

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विश्वविद्यालय शिक्षक चयन आयोग के गठन की है जरूरत
विश्वविद्यालय शिक्षक चयन आयोग के गठन की है जरूरत

देश के सभी विश्वविद्यालयों में सभी शिक्षकों के लिए यूजीसी का एक समान वेतनमान लागू है. यूजीसी ने शिक्षकों के चयन के लिए एक समान योग्यता सुनिश्चित कर रखा है जिसका अनुपालन भी सख्ती से किया जाता है.

देश भर के सभी विश्वविद्यालयों से मिलने वाली उपाधियाँ भी सभी जगह समान रूप से मान्य होती हैं. किन्तु शिक्षकों की चयन- प्रक्रिया को राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ दिया गया है और राज्य सरकारें समान वेतनमान और समान पद वाले शिक्षकों के चयन में अलग- अलग तरीके अपनाती हैं.

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आए दिन वे अपनी सहूलियत के अनुसार चयन-प्रक्रिया में बदलाव करती रहती हैं और उनमें बड़े पैमाने पर धाँधली होती है. इन दिनों देश के दो पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में शिक्षकों के चयन की प्रक्रिया एक साथ चल रही है. दोनो राज्यों में अपनायी गयी प्रक्रियाएं अलग- अलग हैं.

यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश में एक साथ एक ही तरह के शिक्षकों के चयन के लिए कम से कम चार तरह की प्रक्रियाएं अपनायी जा रही हैं.

विश्वविद्यालयों के लिए अलग तरह की, विश्वविद्यालयों से संबद्ध अशासकीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के लिए अलग तरह की, शासकीय महाविद्यालयों के लिए अलग तरह की और स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों के लिये अलग तरह की.

यहाँ तक कि विश्वविद्यालयों की चयन-प्रक्रिया में भी पूरी समानता नहीं है. अपने- अपने विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के लिए वे अपना विज्ञापन निकालते हैं, हजारों आवेदन पत्र आते हैं जिनसे लाखों की कमाई होती है.

आवेदन पत्र आने के बाद कुछ विश्वविद्यालय प्राप्त आवेदन पत्रों की स्क्रीनिंग करते हैं, स्क्रीनिंग में अपनी रुचि और जरूरत के अनुसार पद्धति अपनाते हैं और एक पद के लिए अपनी इच्छानुसार पाँच, सात या दस अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाते हैं.

कुछ विश्वविद्यालय तो सभी आवेदकों को बुला लेते हैं और दो-या तीन पदों के लिए कई- कई दिन तक साक्षात्कार लेते रहते हैं.

जाहिर है, ये साक्षात्कार केवल दिखावे के लिए होते हैं. सबको बुलाया ही इसलिए जाता है कि स्क्रीनिग करने पर उनकी पसंद का अभ्यर्थी छँट कर बाहर हो सकता है.

ऐसे विश्वविद्यालयों में जिनका चयन करना होता है ज्यादातर उनके नाम पहले से तय होते हैं.

मैं उत्तर प्रदेश की बात कर रहा था. उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों से संबंद्ध अशासकीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में चयन के लिए उ.प्र.उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग की ओर से विज्ञापन हुआ है.

नवंबर-दिसंबर में उनकी परीक्षाएं होंगी और फिर साक्षात्कार. कहने लिए तो यह बड़ा ही पारदर्शी पद्धति है, सबको समान अवसर दिया जा रहा है, किन्तु कल्पना कीजिये कि जो अभ्यर्थी नेट उत्तीर्ण करने के बाद चार-पाँच वर्षों से अपने शोध-कार्य में संलग्न है अथवा शोध कर चुका है और जिसने अभी- अभी पोस्टग्रेजुएट या नेट पास किया है, उन दोनों के लिए यह परीक्षा समान रूप से लाभकारी कैसे हो सकती है ?

पी-एच.डी. करने वाला शोधार्थी अपनी सारी ऊर्जा शोध के अपने उस क्षेत्र-विशेष में लगाता है. शोध-पत्र लिखने में खर्च करता है. कई वर्षों से उसका संबंध उन सामान्य विषयों से टूटा हुआ होता है जो परीक्षा के लिए पाठ्यक्रम के रूप में निर्धारित हैं.

ऐसी दशा में शोध के क्षेत्र में लगे रहना उसके लिए घातक होता है जबकि उच्च शिक्षा में शोध को सर्वाधिक महत्व मिलना चाहिए.

जो तरीका उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग अपना रहा है उस तरीके से तो लोक सेवा के अधिकारी चुने जाते हैं, जबकि आयोग को शिक्षक चुनना है. ऐसी दशा में इस पद्धति से शिक्षक पद के लिए भी वे ही अभ्यर्थी अधिक चयनित होते हैं जिनकी रुचि शोध में कम है और जो दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की भी तैयारी करते रहते हैं.

शोध में जिसकी रुचि न हो वह उच्च शिक्षा में शिक्षक पद के लिए कत्तई उपयुक्त नहीं है. इसी तरह सरकारी महाविद्यालयों में शिक्षकों के चयन के लिए कभी परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं तो कभी केवल साक्षात्कार लिये जाते हैं.

उत्तर प्रदेश में स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों की भरमार है. यहाँ आम तौर पर स्थानीय स्तर पर विज्ञापन निकाले जाते हैं और महाविद्यालय का प्रबंधक अपने विश्वविद्यालय से विषय- विशेषज्ञ नियुक्त कराकर अपनी रुचि से शिक्षक का चयन करा लेता है और विश्वविद्यालय उसका अनुमोदन कर देता है.

उतनी ही योग्यता रखने वाले ऐसे शिक्षकों को दस से पंद्रह हजार वेतन दिए जाते हैं. कभी- कभी तो सुनने में आता है कि महाविद्यालय के लिए अनुमोदित शिक्षक कोई और होता है और पढ़ाने का काम कोई दूसरा करता है.

बिहार में भी शिक्षकों के चयन की प्रक्रिया चल रही है. बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के विज्ञापन में अपेक्षाकृत बेहतर तरीका अपनाया जा रहा है. यहाँ परीक्षा नहीं हो रही है. बि.रा.वि.से.आयोग समझता है कि यहाँ आवेदन करने वाले अभ्यर्थी, पोस्टग्रेजुएट और नेट की परीक्षाएं अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर चुके हैं और इनकी फिर से परीक्षा लेनी जरूरी नहीं है.

यहाँ शोध की उपाधि को अधिक महत्व दिया जा रहा है जो एक शिक्षक के चयन के लिए बहुत जरूरी है. यूजीसी भी इसपर अपनी मुहर लगा चुका है.

बिहार में ही वर्ष 2014 में बीपीएससी द्वारा शिक्षकों का जो चयन किया गया और उसमें जो प्रक्रिया अपनाई गई वह पूरी तरह पारदर्शी थी और उसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई. उससे बिहार को बड़ी संख्या में सुयोग्य शिक्षक प्राप्त हुए.

इससे बिहार की शिक्षा-व्यवस्था में बेहतर परिवर्तन के संकेत भी मिल रहे हैं. यह शुभ संकेत है कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग भी बीपीएससी की तरह पूरी पारदर्शिता अपना रहा है. अभी 15 जुलाई 2021 को अंगिका विषय का साक्षात्कार लेने के बाद दूसरे ही दिन उसका परिणाम घोषित करके बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने तो कमाल ही कर दिया.

प.बंगाल में भी शिक्षकों का चयन कॉलेज सर्विस कमीशन करता है. यहाँ भी परीक्षाओं का आयोजन नहीं होता और चयन में पारदर्शिता का पूरा ख्याल रखा जाता है.

कॉलेज सर्विस कमीशन, पश्चिम बंगाल की खूबी यह है कि जहाँ दूसरे राज्यों में कई- कई वर्ष बाद शिक्षकों के चयन के लिए विज्ञापन होते है वहाँ पश्चिम बंगाल में प्राय: प्रति वर्ष शिक्षकों के चयन का कार्य संपन्न हो जाता है.

विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षकों की चयन-प्रक्रिया को लेकर देश के दूसरे राज्यों में भी इसी तरह अलग-अलग और मनमानी पद्धतियाँ अपनायी जा रही हैं.

एक बात और, यूजीसी के रेगुलेशन 2018, भाग-3, खण्ड-4 के संख्या 3.10 के अनुसार इसी महीने से अर्थात् 1 जुलाई 2021 से देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षक बनने के लिए पी-एच.डी. की उपाधि अनिवार्य हो चुकी है. (“The Ph.D. Degree shall be mandatory qualification for direct recruitment to the post of Assistant Professor in Universities with effect from 01.07.2021.”)

ऐसी दशा में अब शोध का धंधा करने वालों की चाँदी हो जाएगी. जहाँ पहले से ही देश के अनेक विश्वविद्यालय अपने यहाँ के शोध के गिरते स्तर के लिए बदनाम हैं, वहाँ शोध के स्तर में और भी गिरावट आएगी.

मुझे डर है कि कहीं निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों में डिग्री की खरीद-बिक्री न शुरू हो जाय. आखिर वे तो मुनाफा कमाने के लिए ही खोले गए हैं.

ऐसी दशा में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बचाए रखने के लिए एक मात्र रास्ता है कि भारत सरकार देश भर के विश्वविद्यालयों और उनसे संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षको के चयन के लिए संघ लोक सेवा आयोग की तरह अखिल भारतीय स्तर पर ‘विश्वविद्यालय शिक्षक चयन आयोग’ जैसे संगठन का यथाशीघ्र गठन करे. इससे पूरे देश में पारदर्शी तरीके से सुयोग्य शिक्षकों का चयन हो सकेगा और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में इजाफा होगा.

आज युवा बेरोजगारों को प्रत्येक विश्वविद्यालयों में एक-एक या दो-दो पदों के लिए आवेदन करने पड़ते हैं. इसमें पैसे तो लगते ही हैं, विश्वविद्यालयों में आवेदन करना बहुत श्रम-साध्य और समय-साध्य भी होता है, क्योंकि इसमें बहुत सी सूचनाएं देनी पड़ती हैं. विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों में मंत्रियों तथा राज्यपालों तक की सिफारिशें आती हैं. कुलपतियों पर भी बहुत दबाव रहता है. उनका ज्यादातर समय तो नियुक्तियां कराने में ही चला जाता है.

यदि शिक्षकों के चयन की जिम्मेदारी से कुलपति मुक्त हो जाएंगे तो वे अपने समय का सदुपयोग विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता के विकास तथा अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगाएंगे, शिक्षकों के चयन के लिए अलग-अलग प्रदेशों में गठित आयोगों की जरूरत नहीं रह जाएगी, इससे सरकारी धन और संसाधनों की बहुत बचत होगी और सबसे महत्वपूर्ण यह कि शिक्षकों के सम्मान में इजाफा होगा जो एक सुसंकृत समाज की पहचान है.

सुना है, हमारे नए शिक्षामंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान बड़े ही सुलझे हुए और विवादरहित व्यक्ति हैं. क्या वे इस दिशा में कुछ पहल करेंगे ?

लेखक: अमरनाथ

नोट:- इस लेख में लेखक ने अपने विचार व्यक्त किये हैं।

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