दीवाली पर सूरन की सब्‍जी जरूर खाएं, छूंछूंदर बनने से बचें

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सूरन की सब्‍जी खाने की परंपरा के पीछे इसका चिकित्‍सकीय महत्‍व बताया जाता है। इसमें कई विटामिन्‍स और खनिज पाए जाते हैं।
सूरन की सब्‍जी खाने की परंपरा के पीछे इसका चिकित्‍सकीय महत्‍व बताया जाता है। इसमें कई विटामिन्‍स और खनिज पाए जाते हैं।
दीवाली सूरन की सब्‍जी खाने की परंपरा के पीछे इसका चिकित्‍सकीय महत्‍व बताया जाता है। इसमें कई विटामिन्‍स और खनिज पाए जाते हैं। इनमें विटामिन बी 1, बी 6, विटामिन सी, आयरन, पोटैशियम, फॉस्‍फोरस, मैगनीशियम, कैलशियम के साथ कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा भी होती है। इसमें एंटीआक्‍सीडेंट और ओमेगा 3  भी पाए जाते हैं।
  • राम धनी द्विवेदी 

दीवाली आते ही बाजार में सूरन (ओल) दिखने लगते हैं। वैसे तो अब यह साल भर मिलता है, लेकिन पहले यह सितंबर से नवंबर तक ही मिलता था। उत्‍तर भारत में दीवाली के दिन इसकी सब्‍जी खाने की पंरपरा है। मेरी मां इसका ठोस कारण तो नहीं बताती थी, लेकिन यह कह कर खिलाती थी कि न खाने पर अगले जन्‍म में छूंछूंदर होना पड़ेगा। भला कौन छूंछूंदर होना चाहेगा, इसलिए बचपन में मन मार कर इसकी सब्‍जी खानी पड़ती थी। अब तो यह अच्‍छी लगने लगी है और बाजार में जब भी दिखता है, जरूर घर आता है। इसकी सब्‍जी सूखी और रसेदार दोनों बनती है। इसका आलू की तरह भर्ता (चोखा) भी बना कर खाया जा सकता है।

सूरन पूरे देश में पाया जाता है। अलग-अलग राज्‍यों में इसका नाम अलग-अलग है जैसे सूरन, ओल, जिमीकंद आदि। इसका वनस्‍पति शास्‍त्रीय नाम है- Amorphophallus paeoniifolius। अंग्रेजी में इसे  elephant foot कहा जाता है, क्‍योंकि इसका आकार हाथी के पांव के निशान की तरह ही दिखता है। यह अरवी और बंडे की तरह जमीन के नीचे पैदा होता है। लेकिन दोनों के पौधों में काफी अंतर होता है। दोनों में खास गुण यह होता है कि दोनों काटते समय हाथ में खुजली पैदा करते हैं और ठीक से न बनाया जाये तो खाते समय गले में खुजली पैदा करते हैं। इसे हम लोगों की तरफ गर (गला) काटना कहते हैं। इसके पीछे इसमें पाया जाने वाला आक्‍जलेट क्रिस्‍टल है, जिसके कण नुकीले होते हैं और उनके ही कारण खुजली पैदा होती है।

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यदि इसकी सब्‍जी बनाते समय इसमें कोई खट्टी चीज जैसे अमचुर, नींबू या मठ्ठा डाल दिया जाए तो यह गर काटना कम हो जाता है। इसी तरह छील कर धोते समय पानी में नमक मिला कर थोड़ी देर रख दिया जाये तो भी कम हो जाता है। अरवी की सब्‍जी के साथ भी ऐसा किया जा सकता है। इसके पत्‍ते गहरे हरे रंग के होते हैं और उनमें भी आक्‍जलेट्स के कारण नुकीली कांटेदार रचनाएं होती  हैं, जो छूने पर हाथ में गड़ती हैं और खुजली भी करती हैं। इसी कारण कोई जानवर इसे खाना पसंद नहीं करता। प्रकृति ने एक तरह से इसे यह रक्षा कवच दिया है।

पहले तो यह घर के पिछवाड़े अपने आप पैदा हो जाता था। अब इसकी बाकायदा खेती की जाती है। हमारे बचपन में घर के पीछे भुरभुरी जमीन या घूर के आसपास इसकी कलियां लगा दी जाती थीं, जो गर्मी में चुपचाप जमीन में पड़ी रहती थीं और बारिश होते ही इसके पौधे उग आते थे। यदि पौधा तीन-चार फुट का हो तो उसे खोदने में नीचे किलो दो किलो का ट्यूमर निकलता है। इसी की सब्‍जी खायी जाती है। देशी सूरन देखने में काला होता है और इसके गोले पर कई गांठें उभरी होती हैं। यह काटने पर गहरे गुलाबी रंग का होता है। यह अधिक खुजली पैदा करता है, इसलिए कम पसंद किया जाता है।

हाईब्रिड सूरन आकार में बड़ा होता है और ऊपर गांठें कम होती हैं। काटने पर यह हल्‍का गुलाबी होता है, कुछ सफेदी लिए। यह कम खुजली पैदा करता है और इसकी सब्‍जी अच्‍छी होती है। यदि इसे मसाले के साथ ठीक से बनाया जाए तो यह बहुत स्‍वादिष्‍ट होती है। इसे काटते समय हाथ में तेल लगा लिया जाए तो आक्‍जलेट्स के क्रिस्‍टल हाथ में नहीं धंसते और खुजली नहीं होती। रबर के दास्‍ताने पहन कर काटने से भी इससे बचा जा सकता है।

इसकी सब्‍जी खाने की परंपरा के पीछे इसका चिकित्‍सकीय महत्‍व बताया जाता है। इसमें कई विटामिन्‍स और खनिज पाए जाते हैं जिनमें विटामिन बी 1, बी 6, विटामिन सी, आयरन, पोटैशियम, फॉस्‍फोरस, मैगनीशियम, कैलशियम के साथ कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा भी होती है। इसमें एंटीआक्‍सीडेंट और ओमेगा 3  भी पाए जाते हैं। इसे कामोद्दीपक भी माना जाता है। सौ ग्राम सूरन में लगभग इतना ही कार्बोहाइड्रेट और कैलोरी होती है। गठिया और दमा के लोगों के लिए भी यह फायदेमंद माना जाता है। चर्मरोग में इसे नहीं खाना चाहिए नहीं तो खुजली बढ़ जाती है।

यह सुपाच्‍य होने के कारण पेट के रोगों खासतौर से कब्‍ज और बवासीर में बहुत उपयोगी होता है। इसका पोटैशियम हृदयरोग से बचाता है और रक्‍तचाप को भी कम करता है। यदि सिर्फ एक बार ही इसे खा लिया जाए तो पर्याप्‍त मात्रा में पोटैशियम शरीर को मिल जाता है। इसमें कैंसर रोधी गुण भी बताए जाते हैं। इसकी तासीर गर्म होती है, इसलिए दीवाली के पहले ठंड शुरू होते ही इसकी सब्‍जी बलगम बनने की प्रकिया को भी रोकती है। कई राज्‍यों खासतौर से गोवा में इसके फूल की भी सब्‍जी बनाई जाती है। लेकिन मैने न तो इसका फूल देखा है और न इसकी सब्‍जी खाई है। यदि साफ कर रखा जाए तो यह सड़ता कम है और काफी दिनों तक सुरक्षित रह सकता है। इसकी सब्‍जी के साथ ही अचार भी बनाया जाता है।इसलिए मेरी मानिए। छूंछूंदर बनने की लाइन में मत लगिए। इस बार दीवाली पर इसकी सब्‍जी जरूर खाएं। हो सके तो छोटी और बड़ी दीवाली दोनों दिन।

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