मुक्तिबोध को पता था कि रूढ़िवादी राम की राजनीति कर सकते हैं

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मुक्तिबोध ने 1950 में ही इस बात को अच्छी तरह ताड़ लिया था कि भारत की सामाजिक रूढ़िवादी ताकतें आने वाले समय में राम की राजनीति कर सकती हैं।
मुक्तिबोध ने 1950 में ही इस बात को अच्छी तरह ताड़ लिया था कि भारत की सामाजिक रूढ़िवादी ताकतें आने वाले समय में राम की राजनीति कर सकती हैं।
मुक्तिबोध ने 1950 में ही इस बात को अच्छी तरह ताड़ लिया था कि भारत की सामाजिक रूढ़िवादी ताकतें आने वाले समय में राम की राजनीति कर सकती हैं। 1950 के दशक में जब प्रगतिशील रामविलास शर्मा भक्तिकालीन  कवि तुलसीदास की सामाजिक रूढ़िवादिता पर मार्क्सवाद का पलोथन लगा रहे थे  और समाजवादी लोहिया ‘रामायण मेला’ आयोजित कर रहे थे; मुक्तिबोध ने इस बात को अच्छी तरह ताड़ लिया था कि भारत की सामाजिक रूढ़िवादी ताकतें राम की राजनीति कर सकती हैं।
  • प्रेमकुमार मणि 
प्रेमकुमार मणि
प्रेमकुमार मणि

आज 13  नवंबर  है, मेरे प्यारे कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिन। आज ही के  दिन 1917  में ग्वालियर के एक कस्बे में वह जन्मे और लम्बी बीमारी झेलते हुए मात्र 47  साल की उम्र में ही 11  सितम्बर 1964  को इस दुनिया से विदा हो गए। जब वह मरे, तब मेरी उम्र कंचे खेलने वाली थी, लेकिन जब समझ की आँखें खुलीं, तब उन्हें अपने बहुत निकट पाया। यह एक संयोग ही कहा जायेगा कि नेहरू  की मृत्यु भी उसी साल यानी 1964  में ही हुई थी। इन दोनों से अनेक अर्थों में मैं प्रभावित हुआ हूँ, इसे स्वीकारने में मुझे संकोच नहीं है।

मुक्तिबोध पर बात करने के लिए मुझे इत्मीनान चाहिए। फिलवक्त इत्मीनान के साथ नहीं हूँ। इसलिए रस्मी तौर पर ही कुछ कहूंगा, लेकिन कहूंगा। इसलिए कि आज यानी इन दिनों मुक्तिबोध बहुत याद आते हैं। खासकर उनकी कविता  ‘अंधेरे में’ मुझे इतनी प्रासंगिक कभी नहीं प्रतीत हुई थी। उसकी कुछ पंक्तियाँ इन दिनों जितनी उद्धृत की गयीं, कभी नहीं की गयी थीं :

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अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे 

उठाने ही होंगे 

तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।

ऐसा प्रतीत होता है, मुक्तिबोध हमारे बाज़ू में बैठकर  कानों में बुदबुदा रहे हों। इन तीन पंक्तियों को हमारे हिंदी समाज ने आत्मसात किया होता तो गुलाम मानसिकता में जीने के लिए आज वह अभिशप्त नहीं होता। बहुत ईमानदारी से कहूं तो हिंदी कविता का अधिकांश मेरी समझ से बाहर रहा  है। येन-केन की गयी तुकबंदियों या फिर अनगढ़ गद्य को हमारे यहाँ कविता कहने का प्रचलन है। गंभीर  कविता के नाम  पर छिछले अध्यात्म या फिर राष्ट्रवाद के कड़ाम-कड़ाम की प्रतिध्वनियां मिलती हैं। यूनिवर्सिटियों में हिंदी कविता के नाम पर वह ही पढ़ाई भी जाती रही हैं। लेकिन सौभाग्य या दुर्भाग्य से मैं इन सब से अप्रभावित रहा हूँ। या इन्हें समझने में असमर्थ रहा हूँ। मुझे इसका कोई अफ़सोस भी नहीं है।

लेकिन बावजूद इन सबके, मैंने  बार-बार स्वयं को कविता के एकांत में होना चाहा है। कविता अपने बुनियादी तत्वों के साथ मुझे आकर्षित करती है। उससे तादात्म्य या संग-साथ करना मेरा प्रिय व्यसन है। वहां  कुछ टटोलता हूँ, ढूंढता हूँ। मेरे लिए कविता मनुष्यता की आत्मा या केन्द्रक है; हमारे जीवन का मूलाधार। और इसलिए कविता के नाम पर जब बकवास सुनता हूँ, तब गहरे खीज  जाता हूँ।

निराला की वैचारिकता से विमत होते हुए भी, उनकी कविता को मैं पसंद करता हूँ, लेकिन उन्हें  प्रिय कहने में मुझे संकोच होगा। कवि या कविता इतने नाजुक विषय हैं कि दस-बीस को प्रिय नहीं बनाया जा सकता। थोड़ी-बहुत खास बातें बहुतों में होती हैं, लेकिन जब प्रिय कहा जाता है, तब सम्भवतः पूर्णता का एक अभिराम रूप चाहिए होता है। इस कठिन निकष पर ही मुक्तिबोध-प्रियता  का चुनाव मैंने किया है।

अज्ञेय ने जब ‘तारसप्तक’ का सम्पादन किया, तब मुक्तिबोध को चुना। तारसप्तक के वह प्रथम कवि हैं। 1943  में तारसप्तक का प्रकाशन हुआ था। तब मुक्तिबोध छब्बीस साल के थे और जीविकोपार्जन के लिए मास्टरी कर रहे थे। उनकी दिनचर्या उनके ही शब्दों में   ‘… नियमानुकूल बारह बजे दोपहर स्कूल जाता है; लौटती बार अपने पैरों से अपनी सिगरेट पर ज्यादा भरोसा रखता हुआ घर की ओर चल पड़ता है। सांझ सात बजे पान वाले की दुकान पर नित्य मिलता है। उज्जैन के फ्रीगंज में कहीं भी इस व्यक्ति को मटरगश्ती करते हुए आप पा सकते हैं।” और  “नौकरियां छोड़ता रहा। शिक्षक, पत्रकार, पुनःशिक्षक, सरकारी और गैरसरकारी नौकरियां। निम्नवर्गीय जीवन, बाल-बच्चे, दवा-दारू, जन्म-मृत्यु।”  आलोचक नंदकिशोर नवल ने मुक्तिबोध पर पढ़ने लायक मोनोग्राफ लिखा है। साहित्य अकादमी से प्रकाशित है। आपको पढ़ने की सलाह दूंगा, यदि जो नहीं पढ़ी हो।

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मुक्तिबोध ने अपनी कविता और विमर्श में अपने ज़माने के जटिल जीवन यथार्थ को सूक्ष्मता की गहराइयों तक पकड़ने की कोशिश की है। उन्होंने स्वयं को व्योमजीवी कलाकार  कभी नहीं माना। एक प्रतिबद्ध सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता की हैसियत से मानवीयता के पक्ष में संघर्ष करते रहे। उनका व्यक्ति और साहित्य दोनों शत-प्रतिशत  राजनीतिक  है। उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता और वैचारिकता को कभी छुपाया नहीं। वह ज्ञान क्या, जिसमे संवेदना न हो, और वह संवेदना क्या, जो ज्ञान से रहित  हो। उन्होंने ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान की समझ दी। वह मस्तमौला नहीं, पूरी तरह  सजग थे, जैसे एक अर्थशास्त्री या दार्शनिक होता है। वह जो भी लिखते थे, पूरी जिम्मेदारी के साथ लिखते थे। उनके मानस की रचना इतनी जटिल-संश्लिष्ट थी कि लगता ही नहीं है कि मध्यप्रदेश के ठेठ सामंती सामाजिक परिवेश में यह सब लिखा गया है।

“कामायनी : एक पुनर्विचार” जैसी किताब हो या फिर “मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन का एक पहलू” जैसा निबंध, या फिर “क्लाड इथर्ली” जैसी कहानी, या कि “अँधेरे में” जैसी कालजयी  कविता; मुक्तिबोध अपने सोच, शिल्प और वितान में बिलकुल अलग दिखते हैं। 1950 के दशक में जब प्रगतिशील रामविलास शर्मा भक्तिकालीन  कवि तुलसीदास की सामाजिक रूढ़िवादिता पर मार्क्सवाद का पलोथन लगा रहे थे  और समाजवादी लोहिया ‘रामायण मेला’ आयोजित कर रहे थे; मुक्तिबोध ने इस बात को अच्छी तरह ताड़ लिया था कि भारत की सामाजिक रूढ़िवादी ताकतें राम की राजनीति कर सकती हैं। 1955 में लिखे अपने लेख ‘मध्ययुगीन भक्तिआंदोलन का एक पहलू’ में वह इसकी गहरी पड़ताल करते हैं। इस लेख को आज भी हमें देखना चाहिए। समकाल के अनेक सामाजिक-राजनैतिक प्रश्नों के जवाब यहां मिल सकते हैं।

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भारतीय साहित्य और इतिहास के जिस द्वंद्व को पूरी प्रतिभा  के बावजूद  निराला समझने से चूक गए थे, या जिस गुत्थी को वह नहीं सुलझा सके थे, मुक्तिबोध ने उसे समझा और सुलझाया। निराला बंगदेश में जन्मे और वहीं पले-बढ़े, लेकिन बंगला नवजागरण के सत को आत्मसात करने से चूक गए। अधिक से अधिक अनुशीलन समाज की चेतना को वह आत्मसात कर सके, ब्रह्मसमाज और टैगोर की चेतना से उनने दूरी बनाये रखी। लेकिन मुक्तिबोध का चरित्र अलग है।  उनका जन्म तो हिंदी देश में हुआ, लेकिन उनका कुल-परिवार महाराष्ट्रीयन था।  मुक्तिबोध ने महाराष्ट्रीय नवजागरण की तिलकवादी राष्ट्रवादी चेतना को छोड़ दिया, जहाँ वर्णवादी कुटिलता राष्ट्रवाद की लिबास में पल-पुस रही थी। इसके बरक्श उन्होंने मराठा नवजागरण की जोतिबा फुले निरूपित ब्राह्म्णवाद-विरोधी  धारा को आत्मसात किया, जिसकी जड़ें मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन में गहरे धंसी थीं और अपने चरित्र में जो अधिक मानवीय थी। हालाकि उन्होंने फुले का कहीं नाम नहीं लिया है, लेकिन भक्तिकाल विषयक अपने आलेख में वह उसी निष्कर्ष पर आए, जहाँ फुले थे।  यही चीज मुक्तिबोध को निराला से अलग और आगे करती है। वर्तमान हिंदी कविता मुक्तिबोध के काव्य-शिल्प का चाहे जितना निर्वहन और विकास कर ले, उनकी चेतना का निर्वहन और विकास आज भी संभव नहीं हो सका है। उनका अनुकरण थोड़ा मुश्किल प्रतीत होता है। बावजूद समकालीन युवा हिंदी कविता पर उनका प्रभाव दूसरों से कहीं अधिक है।

मैंने पहले ही कहा था, मुक्तिबोध पर बात करने के लिए मुझे इत्मीनान चाहिए। लेकिन क्या करूँ, जब बात निकलती है बात पर बात आ जाती है। आज अब बस करता हूँ। उनके जन्मदिन पर कवि की कुछ पंक्तियों से ही उन्हें याद करता हूँ :

अब तक क्या किया 

जीवन क्या जिया !!

बताओ तो किस -किस केलिए तुम दौड़ गए 

करुणा के दृश्यों से हाय ! मुंह मोड़ गए 

बन गए पत्थर; 

बहुत-बहुत ज्यादा लिया, 

दिया बहुत-बहुत कम 

मर गया देश अरे, जीवित रह गए तुम !!  (अँधेरे में)

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