बूझ जाईं मलिकार कि मन चंगा त कठौती में गंगा

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तस्वीरः बाबूलाल जी

पावं लागीं मलिकार। हमरा माई के ईया जबले जियली, एगो काउत कहस- बीसी, तीसी, मकर पचीसी। ओह घरी लरिकाईं में एकर माने ना बुझाइल। एक दिन इयाद परल त माई से पूछनी कि ईया जवन कहस, ओकर माने का होला। माई बतवलस कि जाड़ के बारे में ईया कहस। शुरू में बीस दिन मीठ जाड़ परेला। तीस दिन कड़कड़ा के ठंडा रहेला और सकरात (मकर संक्रांति) से पचीस दिन ले ठंडा के असर रहेला। माई एइमें अउरी एगो बात बतवलस कि चढ़त आ उतरत जाड़ बड़ी बाउर होला। बाकी दिन त आदमी सचेत रहेला। गुदरा-रजाई-कंबल में लुकाइल रहेला। शुरू आ आखिर के ठंडा लोग समझ ना पावे, एह से बेसी लोग एकर शिकार हो जाला। बूझ जाईं मलिकार कि हमहूं एकर शिकार हो गइल रहनी हां।

चार दिन ले त जर-बोखार अइसन चांप दिहलस हा कि बिछावन से खाली किरिया-करम खातिर निकलत रहनी हां। खोंखी (खांसी) अइसन जहुआ दिहले रहल हा कि अबही ले ढांसत-ढांसत करेजा मुंह में आ जाता। काल्ह से तनी आराम बुझाता।

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रउरा ओर त अउरी ठंडा परल होई मलिकार। माई बतवलस कि सुरसती पूजा ले रही। उतरत जाड़ के बचावल बड़ा जरूरी बा। पांड़े बाबा खबर कागज में कवनो डागदर (डाक्टर) साहेब के कहल बात सुनावत रहनी पढ़ के कि जाड़ में परेसर आ चीनिया बेमारी के मरीज के ठंडा पानी से ना नहाये के चाहीं। ठंडा पानी से नहाये के परे त पहिले गोड़-हाथ धोईं। सीधे माथ पर पानी जनि गिराईं। ना त लकवा मार दी। हम त एकरा के मंतर मान के काम कइनी हां। रउरो धेयान राखेब। रउरा त चीनिया आ परेसर दूनो बेमारी बा।

ए मलिकार, एह घरी फेर अयोधिया (अयोध्या) जी में मंदिर के बतकही शुरू भइल बा का। कई दिन से पांड़े बाबा के दुअरा बतकही सुनत बानी। केहू कहेला कि अब बुझाता कि मंदिर ना बनी। फूल छाप (भाजपा) के वोट दिहल बेकार हो गइल। केहू ई कहेला कि मंदिर के फिकिर कवनो नेता के नइखे, सभे अपना कुरसी के जोगाड़ में लागल बा। हमरा इयाद बा मलिकार, अडवानी जी रथ निकलले रहनी त पांच गो ईंटा के दाम हमहू दिहले रहनी। बरिसन बीत गइल। मंदिर ना बनल। जब-जब वोटवा आवेला, ई मंदिर के बतकही शुरू हो जाला।

हमरा नीमन लागल मलिकार, दिल्ली में पढ़े वाला पांड़े बाबा के नतिया के कहलका। ऊ कहत रहे कि मंदिर-मसिजद के फेर में डाल के लोग के बुरबक बनावे ले सन नेतवा। लोगवो अइसने बा। ओकनी के फेर में पड़ के आपन गोतियारी गाछ पर टांग देला। ऊ कहत रहे कि सैकड़ा 99 आदमी गरीब से अउरी गरीब हो गइले आ एक आदमी के आमद 22 गुना बढ़ गइल। पहिले त हमरा ना बुझाइल, बाकिर बाद में ओकरा से पूछनी कि ए बाबू, का सैकड़ा निनानबे के बात बतावत रहुव, तनी हमरो के समझाव। ऊ कहलस- ए ईया, एतने बूझीं कि गरीब लोग अउरी गरीब भइल जाता आ अमीर लोग अउरी अमीर। बड़ा नीक समझवलस। कहलस कि रउरा लगे दू बिगहा खेत बा आ केहू के लगे बीस बिगहा। राउर खेत दू बिगहा से घट के बारह कट्ठा पर आ गइल आ जेकरा लगे बीस बिगहा रहे, ऊ बाईस बिगहा के मालिक हो गइल। एकरे अइसन सैकड़ा निनाबे आदमी गरीब से गरीब भइल जात बाड़े आ एक आदमी के आमदनी बाईस गुना बढ़ गइल बा।

रोजी-रोजगार, पढ़ाई-लिखाई, दवा-दारू, जइसन काम सरकार के करे के चाहीं कि सभका एकर फायदा मिलो। एइ पर केहू के धेयान नइखे। मंदिर खातिर लोग बेचैन बा आ सरकार बुरबक बनावे खातिर तेयार बइठल बिया।

तब से बूझ जाईं मलिकार कि हमार मन अइसन बदल गइल बा कि का कहीं। एही से पुरनिया लोग पहिले कहे कि मन चंगा त कठौती में गंगा। मन साफ होखे के चाहीं। भगवान त मन में बसे ले। पाती लमहर हो गइल बा मलिकार, फेर कबो लिखवायेब। लिखत में तेरह खल के मुंह बनावे लागल बिया बड़की। आपन खेयाल राखेब।

राउर, मलिकाइन

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