बंगाल के नेताओं से सीखें कैसे सादगी से जीया जाता है

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जननायक कर्पूरी ठाकुर का आज जन्मदिन है। कर्पूरी ठाकुर सही मायने में जननायक थे। गरीबों-दलितों के उत्थान के लिए उन्होंने जो किया, वह नहीं भूलेगा।
जननायक कर्पूरी ठाकुर का आज जन्मदिन है। कर्पूरी ठाकुर सही मायने में जननायक थे। गरीबों-दलितों के उत्थान के लिए उन्होंने जो किया, वह नहीं भूलेगा।

बंगाल के नेताओं से सीखें कैसे सादगी से जीया जाता है। किसी को सादगी सीखनी हो तो बंगाल के नेताओं से सीखे। हाल में ज्योति बसु का सादा भोजन चर्चा में है। वही नहीं, वाम दलों के तमाम बड़े नेता सादगीपूर्ण जीवन जीते रहे हैं। वाम दलों को मिला कर बंगाल में बने वाम मोर्चा के चेयरमैन विमान बोस एलआइजी क्वार्टर में रहते हैं। अपने कपड़े  खुद साफ करते हैं। कोई कार नहीं, जबकि बंगाल में साढ़े तीन दशक तक वाम दलों का ही शासन रहा। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहे मानिक सरकार और बंगाल के मुख्यमंत्री रह चुके बुद्धदेव भट्टाचार्य के बास भी कोई कार नहीं है। उनके परिजन आवागमन के लिए आम आदमी की तरह बब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं। प्रसंगवश इसमें जोड़ना आवश्यक है कि बिहार में भी पहले कर्पुरी ठाकुर और भोला पासवान शास्त्री जैसे सीएम रहे हैं, जिनकी सादगी की चर्चा कमी ही होती है। ज्योति बसु की सादगी की खबर आने के बाद वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने कर्पुरी ठाकुर की सादगी का जिक्र फेसबुक वाल पर किसी के पोस्ट पर कमेंट के क्रम में किया है।

  • सुरेंद्र किशोर 
सुरेंद्र किशोर
सुरेंद्र किशोर

ज्योति बसु की कहानी पढ़कर मुझे कर्पूरी ठाकुर की याद आई। सोशलिस्ट पार्टी के एक कार्यकर्ता की हैसियत से 1972-73 में मैं कर्पूरी ठाकुंर का निजी सचिव था। उन दिनों विधायक को वेतन के रूप में 300 रुपए मिलते थे। दैनिक भत्ता 15 रुपए प्रतिदिन। पहले था कि जिस दिन कमेटी की बैठक होगी, उसी दिन का भत्ता मिलेगा। बाद में हुआ कि सात दिनों के भीतर दो बैठकें होंगी तो पूरे सप्ताह का भत्ता मिलेगा।

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बाद में वह बाधा भी दूर हो गई। खैर, उतने पैसे में उन दिनों पटना में परिवार रखना ईमानदार विधायकों के लिए कठिन  था। कर्पूरी ठाकुर अक्सर अपने परिवार को कहा करते थे कि आप लोग जाकर गांव में रहिए।

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उसके विपरीत आज के विधायकों-मंत्रियों को मिल रही सुविधाएं देख लीजिए। यदि भ्रष्टाचार कम करके सरकारी अस्पतालों में गरीबों के इलाज व सरकारी स्कूलों में गरीब बच्चों की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था हो गई होती तो आज के अधिकतर जन प्रतिनिधियों के शालीन जीवन स्तर आम लोगों को नहीं अखरते।

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लगे हाथ एक बात और बता दूं। उन्हीं दिनों की बात है। कर्पूरी जी को तुरंत समस्तीपुर जाना अत्यंत जरूरी था। उनके पास कार नहीं थी। टैक्सी भाड़े के लिए पैसे भी नहीं। उन्होंने महामाया बाबू को फोन किया। पूर्व मुख्यमंत्री खुद कर्पूरी जी को 400 रुपए पटेल पथ पहुंचा गए। वे भी क्या दिन थे! देखते-देखते क्या से क्या हो गया!! चोर मचाये शोर।

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