झारखंड में JVM सुप्रीमो ने अपने ही विधायक को पार्टी से निकाला

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बाबूलाल मरांडी
बाबूलाल मरांडी

RANCHI : झारखंड में एक दल के सुप्रीमो ने अपने ही विधायक को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उसके 3 एमएल में महज अब 2 बचे हैं। झारखंड की राजनीति में एक बार फिर नया प्रयोग हुआ है। 3 विधायकों वाले दल जेवीएम (झारखंड विकास मोरचा) के सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने अपने ही एक विधायक को पार्टी से निष्कासित कर दिया। झारखंड विकास मोर्चा के सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने विधायक बंधु तिर्की को पार्टी से निष्कासित कर दिया है।

जेोवीएम से निष्कासित विधायक बंधु तिर्की
जेोवीएम से निष्कासित विधायक बंधु तिर्की

झारखंड पहले भी राजनीतिक प्रयोग स्थली के तौर पर जाना जाता रहा है। झारखंड में निर्दलीय के मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड रहा है। उस निर्दलीय सीएम के मंत्रिमंडल के आधे सदस्य विभिन्न जांच एजेंसियों से गुजर कर जेल की सजा काट रहे हैं या जेल से जमानत पर बाहर हैं। यह वही झारखंड है, जहां चार मुख्यमंत्री चुनाव हार चुके हैं। झाविमो के बाबूलाल मरांडी, जेएमएम के शिबू सोरेन और भाजपा के अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री रह चुके हैं और उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। अभी-अभी हुए चुनाव में भाजपा कोटे से मुख्यमंत्री बने रघुवर दास को भी पराजय झेलनी पड़ी है।

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झारखंड के राजनीतिक दलों के प्रमुख तो पल भर में साधारण सदस्यों-कार्यकर्ताओं-नेताओं की तरह पाला बदलने में माहिर रहे हैं। शायद ही किसी पार्टी का मौजूदा प्रमुख हो, जो दूसरे दलों से गुजर कर न बना हो।

दरअसल बाबूलाल मरांडी को यह प्रयोग इसलिए करना पड़ा, क्योंकि उन्हें भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना है। इसकी पटकथा चुनाव के पहले ही लिखी जा चुकी थी। इसका पहला संकेत तब मिला था, जब आर्थिक संकट से जूझ रही पार्टी झारखंड विकास मोर्चा को चुनाव में हेलीकॉप्टर से प्रचार करने की सहूलियत हो गई थी। बताते हैं कि इसका इंतजाम भारतीय जनता पार्टी के ही किसी सांसद ने किया था।

चुनाव बाद तकरीबन सभी सीटों पर लड़ने वाली बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा के उन्हें लेकर तीन सदस्य ही जीते। उनमें से दो तो हेमंत सोरेन के नेतृत्व में बनी गठबंधन की सरकार के घटक दलों से ताल्लुकात बढ़ाने लगे थे। बाबूलाल मरांडी भी यही चाहते थे कि उनके दोनों साथी भाजपा में साथ शामिल हो जाएं या अपना ठौर तलाश लें। जब वे नहीं तैयार हुए तो दल बदल कानून के उल्लंघन से बचने के लिए उन्होंने किसी एक को ठिकाने लगाने का फैसला किया। इसमें भाजपा के खिलाफ मुखर रहने वाले बंधु तिर्की आसान निशाना बने।

यह काम भी आसान नहीं था। कार्यसमिति की सहमति आवश्यक थी, जिसके दो सदस्य उनके वे निर्वाचित विधायक थे। उन्हें ठिकाने लगाना जरूरी था। इसलिए उन्होंने पहले कार्यसमिति भंग कर दी और मनोनुकूल कार्यसमिति बनायी। नयी कार्यसमिति में उन दोनों सदस्यों को शामिल नहीं किया, जो उनके दल के टिकट पर विधायक चुनकर आए थे। इससे ही स्पष्ट हो गया था कि बाबूलाल मरांडी भारतीय जनता पार्टी में जाने की तरकीब तलाश रहे हैं।

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नयी कार्यसमिति की बैठक में यह तय हुआ कि बंधु तिर्की को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। अब मरांडी की राह आसान हो गयी है। प्रदीप यादव और बंधु तिर्की में किसी एक को हटाना जरूरी था। इसलिए बाबूलाल मरांडी ने बंधु तिर्की का चुनाव किया। ऐसा इसलिए किया कि वह भाजपा के खिलाफ अधिक मुखर थे। उनके मुखर होने की वजह उनका चुनाव क्षेत्र का सामाजिक परिदृश्य है, जिसमें ज्यादातर आबादी मुसलमानों और ईसाइयों की है। बंधु किसी भी हाल में भाजपा में साथ जाने के लिए तैयार नहीं होते।

प्रदीप यादव अभी सामने नहीं आ रहे हैं, लेकिन उन्होंने चुनाव जीतने के तुरंत बाद जिस तरह से राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से रिम्स के पेइंग वार्ड में मुलाकात की, उससे यह संकेत मिल रहा था कि वे नये ठौर की तलाश में हैं। अब देखना यह होगा कि बाबूलाल मरांडी के साथ प्रदीप यादव भाजपा की शरण में जाते हैं या कोई दूसरा ठिकाना तलाशते हैं।

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