लोक गायकी की सशक्त हस्ताक्षर हैं बिहार की बेटी मीना सिंह

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  • अनूप नारायण सिंह

संगीत को भाषा के बंधन में बांधना कतई उचित नहीं दिखता। ठीक उसी तरह, जैसे पानी के बहाव को बांध से नहीं बांधा जा सकता। इस सच को जमीन पर उतारती दिखती हैं सहरसा की बेटी  मीना सिंह, जिसने  लोक गायन में पहचान बनाते हुए सशक्त हस्तक्षेप किया है। इस गायन यात्रा में उनका साथ देते उनके पति संजय कुमार सिंह। इनकी प्रतिभा को निखारने में इनके पति के साथ इनके सास एवं आईपीएस ससुर कमला सिंह ने भी कोई कोर कसर नहीं रख छोड़े हैं। इनके गायन को परिणित आयाम देने में संपूर्ण परिवार का निरंतर सहयोग रहा है, जिसका सुपरिणाम उनके गायन में झलकता है। मीना सिंह की माता निर्मला सिंह और पिता डीएसपी विजेंद्र सिंह अपनी बेटी के पालन-पोषण में हर वह परिवेश देने की कोशिश करते रहे हैं, जिससे संस्कार,  संस्कृति स्वरूप में विकसित होती है। ऐसा भला क्यों नहीं हो। कोसी की कलकल धाराओं से निकलते सप्त स्वर ने मीना को कब अपने आगोश में ले लिया, कहा नहीं जा सकता है ?

बालपन में सावन भादो में कोसी को मनाने के लिए कोकिला गीत गाती। तब विद्यापति के गीत और कवि मधुकर के नचारी का प्रभाव बालपन में मीना पर गहरी होती गई। संजय के साथ परिणय सूत्र में बंधने के उपरांत उनकी गायन प्रतिभा को एक मजबूत आधार मिला। अपने बचपन में  मीना को पचगछिया घराने के चर्चित गायक पंडित रघु झा, मांगन खवर, उस्ताद स्वरूप दास की गायन की चर्चा अपने विद्यालयों और लोगों से सुनने का अवसर मिला। शादी के उपरांत गायन के विधाओं में लोकगीत गायन को चुनना सांगीतिक संवेदनात्मक सरोकारों को उजागर करता ऐसा माना जाता है कि लोकगीत में जन सामान्य की मनोभावनाओं का लोकपक्ष काफी सबल होता।

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समाज के लोक पक्ष और भाव पक्षों का  सर्वाधिक समन्वय लोकगीतों में समाहित है। मीना सिंह के जीवन में संगीत का आना और अपने उसकी ओर आगे बढ़ना तभी संभव हो पाया, जब पति संजय ने उन्हें संवर्धन देते हुए आगे बढ़ने का अवसर दिया। मीना सिंह ने संगीत की विधिवत शिक्षा बढ़हिया घराने के पंडित श्याम दास मिश्र से ग्रहण करते हुए संगीत की बारीकी को बड़े ही सूक्ष्मता से पकड़ते हुए मंच की ओर आगे बढ़ी तो बढ़ती ही चली गई। इनके कार्यक्रमों का प्रसारण पटना दूरदर्शन और पटना आकाशवाणी से निरंतर होता रहा है।

लोक गायन के क्षेत्र में अपने गायन शैली को लेकर बिहार के वर्तमान परिदृश्य पर दीप्तिमान नक्षत्र के रुप में उभर रहे हैं। इनके खासकर प्रस्तुतीकरण को लेकर विभिन्न मंचों पर इनकी उपस्थिति मायने रखती है। इनके गायन ने सोनपुर वैशाली महोत्सव, गांधी मैदान में आयोजित विहार महोत्सव, बसंत उत्सव में अपना खास असर छोड़ा है। मीना सिंह के गायन में महिषी घराना, पचगछिया घराना, अमता घराना  एवं बड़हिया घराना का प्रभाव परिलक्षित होता है। मीना सिंह भोजपुरी गायन को लेकर इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं, लेकिन मैथिली और हिंदी भी  मीना के  मुकाम में प्राथमिकता में शामिल हैं। इन्होंने सुगम संगीत भजन के साथ को संरक्षित करने की योजना बनाई है।

बिहार केसरी अनिल कुमार पंकज के साथ वार्ता के क्रम में उन्होंने बताया कि हमारे लोकजीवन का अलग वेद रहा है, भेद नहीं। हमारा लोकगीत हमें बाजारवाद के ग्राफ से बचा लेने की दिशा में सक्षम है। हम और हमारा समाज अपनी चीजों की मार्केटिंग नहीं कर सके और हम पिछड़ गए। लोकगीत को बचाने के लिए आंदोलन की जरूरत है, क्योंकि हम लोक चेतना को विकसित नहीं होने देना चाहते। लौकिकता का वास्तविक रेखांकन  लोकगीतों से संभव है। हमें अपने बच्चों में संगीत का संस्कार विकसित करना पड़ेगा। आज का परिवेश उत्तेजना का विकास करता है, जबकि आज समग्रता में धैर्य की जरूरत है। मीना सिंह भोजपुरी के कई चर्चित फिल्मों में गायन कर चुकी हैं। हिंदी की चर्चित टेलीफिल्म विकलांगता अभिशाप नहीं में गायन की है। भोजपुरी देवी गीत  निमिया के डार मैया एवं बेटी बचाओ हिंदी एल्बम में अपनी सशक्त आवाज से बेटी के पक्षों को मजबूत करने का काम किया है।

फिलहाल मीना सिंह अभी भोजपुरी के चर्चित उस्ताद व गुरु मनोरंजन ओझा जी के सानिध्य में भोजपुरी के क्षेत्र में कदम रखने के साथ ही श्री मनोररंजन ओझा जी से फोक म्यूजिक में भी कैरियर सवार रही हैं।

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