कंगना राणावत के बयान को उसका ज्ञान समझने की भूल न करें  

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अंधभक्ति में उड़ेले गये विचार को लिबरल लोग कंगना राणावत का ज्ञान मानने का हठ कर रहे हैं। वह 1947 को इग्नोर कहां कर रही। वह तो आजादी की व्याख्या कर रही है। जैसे टुकड़े-टुकड़े गैंग को इस देश से आजादी चाहिए।
अंधभक्ति में उड़ेले गये विचार को लिबरल लोग कंगना राणावत का ज्ञान मानने का हठ कर रहे हैं। वह 1947 को इग्नोर कहां कर रही। वह तो आजादी की व्याख्या कर रही है। जैसे टुकड़े-टुकड़े गैंग को इस देश से आजादी चाहिए।
अंधभक्ति में उड़ेले गये विचार को लिबरल लोग कंगना राणावत का ज्ञान मानने का हठ कर रहे हैं। वह 1947 को इग्नोर कहां कर रही। वह तो आजादी की व्याख्या कर रही है। जैसे टुकड़े-टुकड़े गैंग को इस देश से आजादी चाहिए। उसी तरह उसे भी लगता है कि देश पहली बार 2014 में तुष्टीकरण के जाल से बाहर आया।
  • उमानाथ लाल दास

अंधभक्ति में उड़ेले गये विचार को लिबरल लोग कंगना राणावत का ज्ञान मानने का हठ कर रहे हैं। वह 1947 को इग्नोर कहां कर रही। वह तो आजादी की व्याख्या कर रही है। जैसे टुकड़े-टुकड़े गैंग को इस देश से आजादी चाहिए। उसी तरह उसे भी लगता है कि देश पहली बार 2014 में तुष्टीकरण के जाल से बाहर आया। वरना अनुच्छेद 370 के अस्थायी उपबंध को संविधान की नियति बना दिया था।

नागरिक संशोधन अधिनियम। रामजन्म भूमि की मुक्ति। यह सब तो आक्रांता की कायम की गयी  सल्तनत और उसके वंशजों के लिए अंग्रेजों की डिवाइड एंड रूल को तुष्टीकरण में ढालनेवाले कहां से ये दिन देखने देते। ठीक है कि विकास और रोजगार का नामलेवा नहीं रहा। तो भाई विकास और रोजगार लीलनेवाली आर्थिक सुधार की नीति का ही तो ये विस्तार कर रहे हैं।

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आत्मनिरीक्षण और आत्मावलोकन से वैर के कारण जिस राजनीति ने वाम को लील लिया। अब कांग्रेस उनके साथ मिलकर भारतीय जनतंत्र को विपक्षहीन करने पर तुली है। कंगना राणावत के बयान पर छाती पीटनेवालो, एक बार एकता कपूर की अश्लीलता और ट्रिपल एक्स वेबसीरीज पर भी तो विचार कर लें। उन्हें भी तो नवाजा गया है। वह तथ्यात्मक भूल नहीं कर रही। यह आवेग का जहर उसकी अंधभक्ति से उपजा है।

यह सरकार दिलीप मंडल, डॉ प्रकाश आंबेडकर, कन्हैया कुमार को तो पद्म पुरस्कार देने से रही। तो कंगना को पद्मश्री देने पर सवाल उठानेवालो ट्रिपल एक्स वेबसीरीज वाली एकता को क्यूं भूल जाते हैं। जो यह नहीं जानते कि केंद्र में मोदी सरकार भाजपा की है तो उनके लिए कंगना राणावत को पद्मश्री दिये जाने पर सवाल उठाना लाजिमी है। लेकिन सोशल मीडिया में कुहराम मचा हुआ है। छाती पीटकर मरसिया गानेवालों में सोशल मीडिया के सारे कांग्रेसी और वामी शामिल हैं।

कंगना को पद्मश्री देने पर इनकी नाराजगी उनकी इस सरकार से अपेक्षा जाहिर करती है कि कंगना को क्यूं, उनको क्यूं नहीं ! जो इस सरकार को जानते हैं, उन्हें तो यह सवाल करना चाहिए कि सुबूही खान, अश्विनी उपाध्याय और पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ को क्यों नहीं। मैं दुबारा कह रहा हूं, कंगना तो तथ्य रखते हुए उसकी भावात्मक व्याख्या में उलझ जाती है, जिसकी वह अधिकारी नहीं। आजादी और संविधान की ऐसी-तैसी करने की एकमात्र कॉपीराइट तो टुकड़े-टुकड़े गैंग को है न! (आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं)

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