चंद्रशेखर जी को सीतामढ़ी आने से मना किया गया, पर वे आए

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चंद्रशेखर (भूतपूर्व प्रधानमंत्री) की पुण्यतिथि पर उनसे जुड़े कई लम्हे दिलो-दिमाग में आने लगे हैं। सीतामढ़ी से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है। 80 के दशक की बात है।
चंद्रशेखर (भूतपूर्व प्रधानमंत्री) की पुण्यतिथि पर उनसे जुड़े कई लम्हे दिलो-दिमाग में आने लगे हैं। सीतामढ़ी से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है। 80 के दशक की बात है।
  • नागेंद्र प्रसाद सिंह

चंद्रशेखर (भूतपूर्व प्रधानमंत्री) की पुण्यतिथि पर उनसे जुड़े कई लम्हे दिलो-दिमाग में आने लगे हैं। सीतामढ़ी से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है। 80 के दशक की बात है। सीतामढ़ी में उनकी सभा तात्कालिक लक्ष्मी उच्च विद्यालय के मैदान (वर्तमान नगर उद्यान) में  होनी थी। उन्हीं दिनों एक रिक्शाचालक को किसी ने लखनदेई पुल से नीचे गिरा दिया था। जिसके के कारण शहर में सांप्रदायिक तनाव को देखते हुए धारा 144 लागू कर सार्वजनिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी गयी थी।

इस आशय का आदेश लेकर स्वयं एसडीएम (शायद केडी चौधरी) ने कोरलहिया पहुंच कर चंद्रशेखर को  बताया। पर वे उसे अनसुना कर सीतामढ़ी सर्किट हाउस आ गये। साथियों से राय की और सभा करने पर सहमति दे दी। चौक-चौराहों पर भारी पुलिस बंदोबस्त, घेराबंदी के बीच हमलोग तैयारी में जुटे। पर, पुलिसिया दहशत से मैदान खाली पड़ा था।

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जब उनकी (चंद्रशेखर की) गाड़ी अस्पताल रोड में मुड़ी, वहां तैनात मजिस्ट्रेट और पुलिस ने बांस बल्ला गिरा कर जबरन रास्ता रोक दिया। हमलोगों की नारेबाजी से सैकड़ों की भीड़ ने अवरोध को हटाया और गाड़ी सभा स्थल पर पहुंच गयी। तबतक एक दुकान में छिपा कर रखे दरी-जाजिम, लाउडस्पीकर लेकर  साथी पहुंच गये। साथियों ने मंच दरी-जाजिम बिछाया। लाउड स्पीकर की आवाज सुनते ही इंतजार में अगल बगल रुके  हजारों  लोग जमा हो गये और चंद्रशेखर जी के 40-45 मिनट के जोरदार भाषण पर तालियां बजा-बजा कर जिन्दाबाद  के नारे लगाते रहे।

प्रशासन ने धारा 144 तोड़ने के आरोप में चंद्रशेखर जी, ठाकुर प्रभाकर सिंह, छात्र नेता लाल बहादुर सिंह, अधिवक्ता अरुण कुमार सिंह, नागेन्द्र प्रसाद सिंह (स्वयं) सहित 11 नेताओं पर मुकदमा कर दिया। हमलोग वर्षों मुकदमा  झेलते रहे। लगातार अनुपस्थिति के कारण चंद्रशेखर जी पर गिरफ्तारी का वारंट जारी हो गया।

इसी बीच युवा तुर्क का खिताब लिए देश की राजनीति में अपनी पहचान स्थापित करने वाले चंद्रशेखर कई बार सीतामढ़ी आए। रीगा किसान आंदोलन के दौरान  ईंखोत्पादक संघ के बैनर तले निषेधाज्ञा को तोड़कर  किसान मैदान में सभा को संबोधित किया। पुलिस ने मैदान में मंच नहीं बनने दिया था। तब मैदान के सटे मध्य विद्यालय की टहारदिवारी के अंदर रात में ही रख दिए गए  दो ट्रैक्टर-ट्राली  को चौकी से पाटकर बनाये गए मंच से उन्होंने भाषण दिया। व्यवस्था को ललकारा और लोगों से आर्थिक सहयोग मांगा। कतार में लगकर लोगों ने छोटी-बड़ी राशि दी, जिसे उन्होंने संघ को दे दिया।

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फिर कन्याकुमारी से दिल्ली  की छह महीने की ऐतिहासिक पदयात्रा, जिसमें मैं कई  साथियों के साथ  पलवल  में शामिल हुआ था, की कड़ी रीगा से जुड़ गयी। वे रामबृक्ष महतो, मुखिया के पंचायत भवन, कुसमारी  में खीर-पूड़ी खाये। बज्जिकांचल के आव भगत से गदगद होते हुए दूसरे दिन बखरी मठ पहुंचने पर उनकी पदयात्रा की समाप्ति हुई। चर्चित भोड़सी आश्रम के तर्ज पर भारत यात्रा ट्रस्ट के लिए महंत जी से जमीन मांगी, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकारा। पर काम आगे नहीं बढ़  पाया। इसी दौरान  वे शाम को गोयनका कालेज में वुद्धिजीवियों की एक बैठक में शामिल होने पहुंचे। कालेज के प्राध्यापक गण  जुटे थे। प्रशासन को किसी ने खबर कर दी। डीएसपी गिरफ्तारी का वारंट लेकर पुलिस बल के साथ कालेज गेट पर पहुंचे। भीड़ जुटने लगी, बड़ी मशक्कत से इसकी सूचना अधिवक्ता अरुण कुमार सिंह  के मार्फत हरिकिशोर बाबू ने चंद्रशेखर जी को दी। सुनते ही वे गुस्से में आ गये। सबको झिड़का और पुलिस अफसर को बुलाने को कहा। डीएसपी उल्टे पांव वापस लौटे। कॉलेज गेट के सामने एक बिजली की दुकान से  हालात की एसपी को जानकारी दी। अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की। इधर घंटा भर के बाद मीटिंग समाप्त हुई। चंद्रशेखर जी प्रस्थान कर गए, पुलिस आती ही रह गयी।

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