बिहार इलेक्शन खत्म हो गया, लेकिन सियासी गर्मी अब भी बरकरार

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बिहार में इलेक्शन भले खत्म हो गया, लेकिन सियासी गर्मी अब भी बरकरार है। बिहार में राज्यसभा की एक सीट पर चुनाव होना है। एलजेपी नेता रामविलास पासवान के निधन से यह सीट खाली हुई है।
बिहार में इलेक्शन भले खत्म हो गया, लेकिन सियासी गर्मी अब भी बरकरार है। बिहार में राज्यसभा की एक सीट पर चुनाव होना है। एलजेपी नेता रामविलास पासवान के निधन से यह सीट खाली हुई है।

पटना। बिहार इलेक्शन भले खत्म हो गया, लेकिन सियासी गर्मी अब भी बरकरार है। बिहार इलेक्शन के बाद राज्यसभा की एक सीट पर चुनाव होना है। एलजेपी नेता रामविलास पासवान के निधन से यह सीट खाली हुई है। एलजेपी को अनुमान था कि जिस तरह प्रधानमंत्री ने रामविलास पासवान के निधन पर शोक जताया था, उससे बिहार में बागी बने चिराग पासवान को नादान समझ बीजेपी माफ कर देगी और यह सीट रामविलास पासवान की पत्नी रीना पासवान को देगी। पर, ऐसा नहीं हुआ। बिहार की राजनीति में मुख्य धारा से किनारे किये गये सुशील कुमार मोदी को बीजेपी ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है।

अब इतना तो साफ हो गया है कि चिराग पासवान को अपने बूते मां रीना पासवान को राज्यसभा भेजना संभव नहीं है। केंद्र में मंत्री पद मिलना भी संदिग्ध है। चिराग के तेवर भी बदले नजर आते हैं। नीतीश कुमार से उनकी खुन्नस जगजाहिर है। शायद यही वजह है कि कम सीटों के बावजूद बीजेपी द्वारा मुख्यमंत्री बनाये गये नीतीश कुमार की सरकार को लक्ष्य कर उन्होंने पार्टी के स्थापना दिवस पर कह दिया कि बिहार की सरकार किसी भी वक्त गिर सकती है। यह पांच साल तक चलने वाली नहीं। मध्यावधि चुनाव के लिए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को तैयार रहने के लिए कहा है। इस बार तो उनकी तैयारी विधानसभा की 243 सीटों के लिए है।

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चिराग के एनडीए से बिगड़ते रिश्ते को भुनाने में आरजेडी जुट गया है। आरजेडी के प्रवक्ता शक्ति यादव ने तो यह भी कह दिया है कि चिराग अपनी मां रीना पासवान को उम्मीदवार बनायें, आरजेडी के साथ महागठबंधन के सभी दल उनका साथ देंगे। अब चिराग पासवान को तय करना है कि वे नरेंद्र मोदी के अब भी हुनमान बने रहना चाहते हैं कि बिहार की राजनीति में एक नये ध्रुवीकरण की कोशिश का हिस्सा बनते हैं।

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दरअसल जीतनराम मांझी के जेडीयू से सट जाने के बाद आरजेडी में कद्दावर दलित नेता की कमी महसूस की जा रही है। विधानसभा में 75 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरे आरजेडी को भरोसा है कि अगर दलित नेतृत्व भी महागठबंधन का हिस्सेदार बन जाये तो उसकी ताकत और बढ़ जाएगी। यादव और मुसलिम के वोट तो उसके हैं ही, पिछड़ों का भी समर्थन उसे हासिल है। अगर कोई दलित नेता साथ आ जाये तो दलितों में भी आरजेडी की पैठ हो सकती है।

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