अल्पविराम के बाद फिर चला काली के देस कलकत्ता

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  • ओमप्रकाश अश्क

आमतौर पर आदमी अमंगल से भयभीत होता है, पर यह भूल जाता है कि अमंगल में भी कल्याण के बीज भी छिपे होते हैं। प्रथमदृष्टया घर का टूटना पीड़ादायक लगता है, लेकिन नयी अट्टालिका की नींव डालने के लिए पुराने का टूटना भी तो जरूरी है। चार महीने तक की बेकारी में मैं गांव से बाहर नहीं गया। योजनाएं बनती रहीं। पैसे खत्म हो चुके थे। परेशानियां अपना जोर दिखाने लगी थीं। हिन्दुस्तान जाने की बात तो की थी, पर उसका कोई जवाब नहीं आ रहा था।

दिसंबर 1999 की कोई तारीख रही होगी। पैसों की तंगी से परेशान होकर मैंने प्रभात खबर से फुल एंड फाइनल कराने का उपाय सूझा। नौकरी छोड़ने के बाद भी सीधे प्रधान संपादक से बात करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। एक उपाय सूझा। उन दिनों हरिवंश जी और केके गोयनका जी के पास मोबाइल फोन आ गया था। उन पर कहीं से भी किसी फोन से लोकल काल हो जाता था। दो रुपये देकर मैंने अपने भतीजे को मीरगंज (मेरे इलाके का शहर, जो गोपालगंज जिले में है) भेजा और हरिवंश जी और गोयनका जी का मोबाइल नंबर दिया। उससे कहा कि पहले गोयनका जी के नंबर पर काल करना और लग जाये तो बताना कि तुम अश्क के भतीजे हो। अश्क जी ने पूछा है कि उनके गये बगैर उनका फुल एंड फाइनल हो सकता है क्या। अगर वह अथारिटी लेटर दे दें तो पैसा उस आदमी को मिल पायेगा। संयोग से गोयनका जी का मोबाइल एंगेज मिला तो उसने हरिवंश जी को फोन लगा दिया।

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हरिवंश जी ने कहा कि अश्क को ही पैसे मिलेंगे। उन्हें 14 दिसंबर तक आने को कहो। वह लौट आया और मुझे सारी बातें बतायीं। मुझे एक बात खटकी कि 14 दिसंबर तक ही क्यों। फिर सोचा कि संभव है कि उसके बाद उन्हें कहीं बाहर निकलना हो। मैं मानसिक तौर पर अपने को रांची जाने के लिए तैयार करने लगा।

14 दिसंबर की सुबह जो बस मुझे बस रांची पहुंचा देती, वह रास्ते में दो-तीन जगह खराब होती रही और अंततः शाम पांच बजे के आसपास रांची के बूटी मोड़ तक ही गयी। शाम होने को थी। मैंने हरिवंश जी के नंबर पर हिम्मत जुटा कर फोन किया। उधर से आयी आवाज साफ नहीं थी। मुझे लगा, कोई और है। जैसे ही मैंने कहा कि मुझे हरिवंश जी से बात करनी है तो उधर से आवाज आयी- अरे पागल, कहां हो। इस तरह कोई नौकरी छोड़ता है। मैंने सुन लिया और बताया कि बस ने बूटी मोड़ तक ही छोड़ा है। यहां से आने में जितना वक्त लगे। उन्होंने कहा कि तुम सीधे मेरे पास आना।

आधे घंटे के अंदर मैं प्रभात खबर के गेट पर था। वाचमैन ने रजिस्टर में अपना नाम और किससे मिलना है, यह लिखने को कहा। जैसे ही मैंने ओमप्रकाश लिखा, उसने रोका- आप अश्क जी हैं। हां, कहने पर उसने कहा कि थछोड़ दीजिए, आप सीधे सर के कमरे में चले जाइए। मैं बीच में पड़ने वाले संपादकीय विभाग की ओर ताके बगैर उनके कमरे में प्रवेश किया। तब कोई सज्जन उनके पास बैठ थे। शायद कोई बिल्डर थे, किसी फ्लैट के बारे में उन्हें बता रहे थे।

मेरे जाते ही उन्होंने उनसे कहा कि कल बात करते हैं, अभी मुझे एक जगह निकलना है। फिर मुझे साथ लेकर नीचे आ गये और गाड़ी में बिठा कर निकल गये। रास्ते में पूछा कि कहां ठहरे हो, अगर कोई दिकक्कत हो तो रहने का इंतजाम कर देंगे। जब मैंने बताया कि मैं अपने भतीजे के घर ठहरूंगा। वह रांची यूनिवर्सिटी में वीसी के पीए हैं। फिर उन्होंने अशोकनगर के अपने आवास का पता दिया और कहा कि कल सुबह 10 बजे वहीं पहुंचो, बात करते हैं।

अगले दिन नियत समय पर हम घर पहुंच गये। कुछ देर के लिए वह बाहर गये थे। बेटे को उन्होंने कह रखा था कि अश्क आयें तो बिठाना। दस-पंद्रह मिनट ही बीते होंगे की वे आ गये। आते ही हालचाल पूछा। नौकरी छोड़ने का कारण पूछा, यह कहते हुए कि ऐसे नौकरी छोड़ी जाती है। मैंने अपनी पीड़ा बतायी कि राजधानी से जिला में आप ने भेजा, यह भी नहीं सोचा कि बच्चों का एडमिशन मैंने पटना में करा लिया है। इस पर उनका जवाब था कि धनबाद जैसी जगह के लिए मुझे कोई दिख नहीं रहा था और रही बात बच्चों की तो मैंने इस पर ध्यान ही नहीं दिया था। खैर, वे बाजार से अमरूद लेकर आये थे। अमरूद उनका पसंदीदा फल है।   उनके अमरूद प्रेम पर कभी अलग से लिखूंगा।

उन्होंने सीधे पूछा कि तुम्हें कौन-सी जगह पसंद है। इस पर मैंने कहा कि पसंद तो कलकत्ता है, लेकिन अभी कलकत्ता में तो कुछ है नहीं। इस पर उन्होंने कहा कि जाओ कलकत्ता। मैंने पूछा, वहां क्या करूंगा। उन्होंने कहा कि अखबार निकालने का प्लान करो। कब जाओगे। मैंने जवाब दिया कि सोच कर बताऊंगा। इसलिए कि 15 दिसंबर से खरमास शुरू हो गया। उन्होंने कहा कि 30 तारीख तक मुझे बता देना। इसके बाद वह मुझे अपने कमरे में ले गये और बिछावन के नीचे से तीन लिफाफे निकाले। उन लिफाफों में पैसे थे। दरअसल सैलरी से अलग हर महीने एक निश्चित राशि वह मुझे देते थे। जून से अगस्त के बीच उनसे मिलना नहीं हुआ था तो वे लिफाफे उन्होंने अपने पास ही रखे थे। फाइनल के लिए उन्होंने अपने साथ ही दफ्तर चलने को कहा तो मैंने मना कर दिया, यह कह कर कि स्कूटर से अपने भतीजे के साथ आ जाऊंगा।

दफ्तर पहुंचे तो एचआर (तब इस विभाग को पर्सनल कहा जाता था) का काम देख रहे आरके दत्ता जी ने से कह कर उन्होंने मेरा हिसाब करा दिया और भुगतान भी हो गया। जाते समय उन्होंने मेरा कांटैक्ट नंबर रख लिया, जो पटना वाले किराये के मकान का था। वहां मेरे गांव का एक भतीजा रहता था।

30 दसंबर तक हरिवंश जी से मेरे भतीजे से दो बार पूछ चुके थे कि अश्क ने कोई सूचना भेजी है। गांव आने पर उसने मुझे बताया। मैंने कहा कि अब फोन आये तो बता देना कि मैं कलकत्ता जाने के लिए तैयार हूं और 14 जनवरी को रांची पहुंचूंगा।

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कलकत्ता जाने के नाम पर बच्चे भी खुश थे और दोबारा नौकरी मिल जाने के कारण घर-परिवार में भी खुशी थी। 14 जनवरी को मैं पटना पहुंच गया। तब तक उनका दो बार फोन आ चुका था कि मैं आया कि नहीं।  शाम में मेरी बात हुई। उन्होंने पूछा कि आज तो तुमको रांची पहुंचना था तो मैंने कहा कि तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए कल निकलूंगा। उनको आश्वस्त कर हम अपने साथियों से गप मारने में जुट गये। साथी थे अजय कुमार और रजनीश।

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अगले दिन रांची के लिए निकला और अंततः 16 जनवरी को पहुंच गया। वह कोई शनिवार था। उन्होंने कहा कि तुम कलकत्ता निकलो, कल केके गोयनका जी भी जाएंगे। आफिस देखना है और अखबार की प्लानिंग करनी है। दत्ता जी से अपना कांट्रैक्ट लेटर ले लेना। मैंने कहा कि आज शनिवार है, किसी और दिन ले लूंगा। दरअसल अब तक जहां-जहां नौकरी की या छोड़ी, संयोग से दोनों शनिवार के दिन ही हुए। यह भी दिलचस्प है कि दत्ता जी ने कूरियर से लेटर भेजा, वह भी शनिवार को ही मिला। इस तरह मैं एक बार फिर काली के देस कलकत्ता (अब कोलकाता) के लिए रवाना हो गया।

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