लोकतांत्रिक इतिहास का काला पन्ना है आपातकाल

0
166
इंदिरा गांधीः आपातकाल की प्रणेता
इंदिरा गांधीः आपातकाल की प्रणेता
  • नवीन शर्मा

लोकतांत्रिक इतिहास का काला पन्ना है आपातकाल। निरंकुश राजतंत्र की तुलना में लोकतंत्र काफी अच्छी व्यवस्था है। यह शासन व्यवस्था को निरंकुश होने से रोकता है। उसे ढंग से काम करने को प्रेरित करने की प्रणाली है। इस व्यवस्था में कोई सरकार अगर ढंग से काम नहीं कर रही है या कोई ऐसा निर्णय ले लिया है, जो आम लोगों को एकदम पसंद नहीं हो तो ऐसे में सरकार को बदलने का हक लोगों को रहता है। चुनाव के मौके पर अपने वोट का इस्तेमाल कर जनता ऐसी सरकार को हटा सकती है।

वहीं दूसरी तरफ सत्ता या पद का अपना एक नशा होता है, मोह होता है। ज्यादातर लोग एक बार कोई पद या सत्ता मिल जाने पर उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं। लोकतंत्र में इसी कुरीति से निजात पाने के लिए एक तय अवधि के बाद चुनाव के जरिये लोगों को नई सरकार चुनने का मौका दिया जाता है। इंदिरा गांधी ने भी सत्ता नहीं छोड़ने की जिद्द में आपातकाल की घोषणा की थी।

- Advertisement -

आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू काफी लोकप्रिय पीएम थे। सन 1964 में उनकी मौत के समय इंदिरा अनुभवहीन थीं। इसलिए उस समय कांग्रेसियों ने लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री चुना था। शास्त्री जी के मंत्रिमंडल में इंदिरा सूचना एवं प्रसारण मंत्री रही थीं। शास्त्री जी की असामयिक और संदेहास्पद स्थिति में ताशकंद में हुई मौत के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज ने इंदिरा गांधी को पीएम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। उस समय इंदिरा गांधी कांग्रेस में सबसे कद्दावर नेता नहीं थीं। उनसे कई वरिष्ठ, जानकार जनाधार वाले नेता थे, लेकिन केवल नेहरू की बेटी होने की वजह से उनको 1966 में पीएम पद पर बैठाया गया। इंदिरा का व्यक्तित्व भी उस समय कोई खास नहीं था। यहां तक कि वे संसद में भी चुप ही रहती थीं, जिसके कारण मोरारजी देसाई ने उन्हें गूंगी गुड़िया तक कह डाला।

1967 में हुए चुनाव में काफी सीटें गंवाने के बाद भी इंदिरा के नेतृत्ववाली कांग्रेस को बहुत मिला। इंदिरा गांधी ने धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व का विकास भी किया और कांग्रेस से अपने विरोधियों के अलग हो जाने पर पार्टी पर पूरी तरह अपना सिक्का स्थापित कर लिया। इंदिरा ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और हरित क्रांति से उत्पादन बढ़ाने की सफलता से लोकप्रियता हासिल की। 1971 में बांग्लादेश को स्वतंत्रत कराने को लेकर पाकिस्तान से हुए युद्ध ने इंदिरा गांधी को भारत की सबसे लोकप्रिय नेता बना दिया था। लेकिन इंदिरा का स्वभाव निरंकुश शासनवाला रहा है। इसलिए उन्होंने विपक्षी दलों द्वारा शासित कई राज्यों में बेवजह राष्ट्रपति शासन लागू करने की परंपरा शुरू करने की गुस्ताखी की थी।

यह भी पढ़ेंः एनुअल इंक्रीमेंटल परफार्मेंस में झारखंड देश में टॉप पर

राज नारायण (जो बार-बार रायबरेली संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से लड़ते और हारते रहे थे) द्वारा दायर एक चुनाव याचिका में कथित तौर पर भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को रद घोषित कर दिया। उनको लोकसभा सीट छोड़ने तथा छह वर्षों के लिए चुनाव में भाग लेने पर प्रतिबंध का आदेश दिया। प्रधानमंत्री के लिए संसद का सदस्य होना अनिवार्य है। इस प्रकार, इस निर्णय ने उन्हें प्रभावी रूप से पीएम के पद से भी मुक्त कर दिया।

यह भी पढ़ेंः फिल्मों में माताओं की माता की पहचान थी लीला चिटणीस की 

इस निर्णय से इंदिरा गांधी बौखला गईं। वे किसी भी कीमत पर पीएम पद छोड़ना नहीं चाहती थीं। इसी दौरान उनकी सलाहकार मंडली ने उन्हें आपातकाल लागू करने की  सलाह दी। जिसे मानकर उन्होंने आनन-फानन में  26 जून 1975 को संविधान की धारा- 352 के प्रावधानानुसार आपातकाल घोषणा कर दी। लोकतांत्रिक देश में इस आत्मघाती कदम ने देश को एक अप्रत्याशित स्थिति में ला दिया। नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए। प्रेस की स्वतंत्रतता पर भी सेंसरशिप थोपी गई। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी का शासन में हस्तक्षेप इतना बढ़ गया कि वो शैडो पीएम की तरह व्यवहार करने लगे। उनके अनावश्यक हस्तक्षेप से तंग आकर तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री आइके गुजराल ने इस्तीफा तक दे दिया था।

यह भी पढ़ेंः रिम्स में मरीजों को निजी अस्पताल जैसी व्यवस्था का निर्देश

आपातकाल के दौरान की जाने वाली ज्यादातियों ने विपक्षी दलों को सुनहरा मौका दिया। इंदिरा गांधी की इस निरंकुशता के खिलाफ लगभग पूरा विपक्ष एकजुट हो गया। जयप्रकाश नारायण यानि जेपी के नेतृत्व में जोरदार आंदोलन चला। जनता के दबाव में करीब डेढ़ साल बाद इंदिरा को चुनाव कराने के लिए बाध्य होना पड़ा। एकजुट विपक्ष ने जनता दल बनाकर लोगों से “लोकतंत्र और तानाशाही” के बीच चुनाव करने को कहा। भारत की जनता ने भारी मत से लोकतंत्र के पक्ष में अपना जनादेश दिया। इंदिरा और संजय गांधी दोनों ने अपनी सीट खो दीं और कांग्रेस घटकर 153 सीटों में सिमट गई (पिछली लोकसभा में 350 की तुलना में) जिसमे 92 दक्षिण से थीं। यह भारत की जनता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके विश्वास की ऐतिहासिक विजय थी।  इस चुनाव ने निरंकुश शासन की इच्छा करनेवालों को कड़ी चेतावनी देते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था का झंडा बुलंद किया।

यह भी पढ़ेंः नौकरशाही के दलदल में फंस गया है नीतीश का परिवर्तन रथ

- Advertisement -