बिहार की राजनीति को समझना मुश्कल ही नहीं, नामुमकिन है

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बिहार की राजनीति को समझना मुश्कल ही नहीं, नामुमकिन है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर में विपक्ष साफ हो गया था।
बिहार की राजनीति को समझना मुश्कल ही नहीं, नामुमकिन है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर में विपक्ष साफ हो गया था।

पटना। बिहार की राजनीति को समझना मुश्कल ही नहीं, नामुमकिन है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर में विपक्ष साफ हो गया था। नतीजा घोषित होते ही जदयू-कांग्रेस और आरजेडी में ध्रुवीकरण की कवायद शुरू हो गयी थी। लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने बाद विधानसभा की रिक्त 10 सीटों पर उपचुनाव हुए। इन उपचुनावों में एक दूसरे की राजनीति  के कट्टर विरोधी लालू और नीतीश ने एक दूसरे से  हाथ मिलाया और नतीजतन  भाजपा को एक पटकनी झेलनी पड़ी। दस में से छह सीटें अब भाजपा विरोध में थीं। यह चार महीने के भीतर का परिवर्तन था। 2015 के नवंबर में विधानसभा के चुनाव हुए। भाजपा गठबंधन के खिलाफ राजद, जदयू और कांग्रेस ने एक मोर्चा बनाया, जिसे महागठबंधन कहा गया। इस गठबंधन ने भाजपा गठबंधन को धूल चटा दी। यह दृश्य बिहार की राजनीति को समझने वालों को उलझा कर रख देगा।

2015 के विधानसभा चुनाव में 243 सीटों वाली विधानसभा में महागठबंधन 178 और एनडीए 58 पर थी। दोनों के बीच 120 सीटों और 7 .6 फीसद वोटों का अंतर था। महागठबंधन को 41 .7 फीसद वोट मिले थे। महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी थी, जिसे 80 सीटें मिली थीं। जेडीयू को 71 और  कांग्रेस को 27 सीटें मिली थीं। आरजेडी, जेडीयू ने 101-101 और कांग्रेस ने 41 पर चुनाव लड़े थे। भाजपा 160 सीटों पर लड़कर 53 सीटें, रामविलास 40 पर लड़कर केवल 2 , उपेंद्र 23 पर लड़कर 2 और मांझी 20 पर लड़कर 1  सीट ला सके थे।

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बिहार की राजनीति एक रूप यह भी देखें। बड़ी पार्टी होते हुए भी आरजेडी ने जेडीयू नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया। आरजेडी और कांग्रेस सरकार में शामिल हुए। बीस महीने तक यह सरकार  चली। 26 जुलाई 2017 को एक नाटकीय राजनीतिक परिवर्तन हुआ। नीतीश कुमार ने अपने सहयोगी दल आरजेडी विधायक दल के नेता और उपमुख्यमंत्री  तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोपों के मद्देनज़र मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन अगले ही घंटे वह अपने विरोधी, जिसके खिलाफ जनादेश लेकर वह विधानसभा में आये थे, से हाथ मिला लिया। भाजपा की राजनीतिक छत्रछाया में नीतीश फिर मुख्यमंत्री हो गए।

राजनीति में कुछ भी संभव है। लेकिन नीतीश कुमार की इस राजनीतिक अस्थिरता को नागरिकों ने अच्छा नहीं माना। उनकी छवि अबतक साफ़-सुथरी थी। एक  झटके में इस घटना ने उस पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया। यदि उन्होंने भाजपा से हाथ न मिलाया होता और इस्तीफा देकर बैठ गए होते तो उनकी नैतिकता  के समक्ष संभवतः आरजेडी को भी झुकना पड़ता। नीतीश का नैतिक कद बहुत ऊँचा हो जाता। लेकिन भाजपा की राजनीतिक गोद में जाते ही उनकी किरकिरी हो गयी। नैतिकता का अभाव तो अब उनके पास था। उन्होंने अपने मतदाताओं को धोखा दिया था। यदि वोट को वह जाति-परस्त कबायली न मानकर राजनीतिक रुझान का मानते हैं, तब उनकी पार्टी, जो महागठबंधन की भागीदार थी, को  प्राप्त वोट भाजपा विरोधी था और सरकार बनाने के लिए था। ऐसे में  उनकी पार्टी के विधायकों को तटस्थ रहने की भी नैतिक छूट नहीं थी। भाजपा के साथ जाना तो एक अलग ही सवाल था।

राजनीति का मतलब सत्ता हथियाना  ही नहीं होता। नैतिकता और आदर्शों के लिए अनेक लोगों ने सत्ता का त्याग किया है; और वे जनता के आदर्श बने  हैं। नीतीश कुमार इस आदर्श के करीब पहुँच कर भाग आये, यह उनके व्यक्तित्व के लिए ही  दुखद हुआ। इसके उलट उन्होंने जो किया, वह प्रथमदृष्टया  ही राजनीतिक भ्रष्टाचरण था। दुर्भाग्य से भारत का कुलीन प्रेस अपनी सुविधा के लिए केवल आर्थिक भ्रष्टाचरण को ही अनैतिक मानता है। भाजपा के साथ वाली नीतीश सरकार को अर्बन द्विज तबके के बड़े हिस्से का समर्थन मिला। यह तबका कट्टर जातिवादी भी था। राजनीतिक रूप से भाजपा समर्थक। प्रांतीय स्तर पर सत्ता से दूर हो चुका था। इसकी किस्मत का छींका फूटा। जिन्हें जनता ने सत्ता से भगाया था, उसे नीतीश की राजनीति ने सत्ता के केंद्र में ला दिया। यह उनकी स्पष्टतया जीत थी। इसका जश्न उन्होंने जम कर मनाया।

लेकिन महीना भी नहीं हुआ था कि भागलपुर से सैकड़ों करोड़ के सृजन घोटाले  का मामला ‘प्रकट’ हुआ। यह घोटाला चारा-घोटाले से कहीं बड़ा था। थोड़ी किरकिरी हुई। लेकिन खलनायक बनाने के लिए कोई लालू प्रसाद नहीं था। नीतीश कुमार खलनायक कैसे बन सकते थे। मामले की लीपापोती हो गयी। अब तो उसकी चर्चा भी नहीं होती। उसके बाद कई तरह की वित्तीय अनिमितताओं की खबरें आईं और गईं। यह स्पष्ट हो चुका था, घोटालों के पर्दाफाश नीतीश सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। आखिर में मुजफ्फरपुर का लोमहर्षक बवाल! मीडिया इन्हें भी पचा गया।

RJD किनारे रह कर भी बिहार में किंग मेकर की भूमिका निभाता रहेगा। अपने जनाधार के कारण आरजेडी नेता लालू प्रसाद कभी किंग मेकर की भूमिका हुआ करते थे। RJD के जातीय समीकरणों में कोई कितना भी सेंध लगा ले, पर इसका पूरी तरह खत्म होना नामुमकिन है। यादवों और मुसलमानों की पहली पसंद अब भी राजद बना हुआ है।

2019 के लोकसभा चुनाव में राजद ने अकेले 16 प्रतिशत वोट हासिल कर साबित किया है कि बिहार में एनडीए के दो बड़े घटक दल बीजेपी और जेडीयू में कभी खटपट हुई तो दोनों दलों में कोई भी आरजेडी को साथ लेकर मैदान फतह कर सकता है। इसे समझने के लिए लोकसभा चुनाव 2019 के आंकड़ों पर गौर करें। बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और बीजेपी ने समेकित रूप से 53.25 प्रतिशत वोट हासिल किये थे। लोजपा का वोट प्रतिशत 2014 के 6.40 से बढ़ कर 2019 में 7.88 प्रतिशत रहा। जदयू का वोट प्रतिशत 2014 के 16.4 प्रतिशत से बढ़ कर 2019 में 21.8 प्रतिशत हो गया। बीजेपी के वोट प्रतिशत में इन दो चुनावों के दौरान कमी दर्ज की गयी। बीजेपी को 2014 में 29.4 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2019 में 23.58 प्रतिशत पर आ गये। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 2014 में बीजेपी राज्य की 22 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी थी, लेकिन 2019 में समझौते के तहत भाजपा ने अपने बराबर 17 सीटें जदयू को दे दी थीं। बीजेपी का वोट प्रतिशत घटने और जदयू का बढ़ने के पीछे बड़ी वजह यही है। अब बात करते हैं आरजेडी की। आरजेडी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में तकरीबन 20 प्रतिशत वोट हासिल किये थे। 2019 के चुनाव में आरजेडी को 4.74 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ और इसे 15.36 प्रतिशत वोट मिले।

आरजेडी में फिलवक्त तेजस्वी यादव अग्रणी पंक्ति के अव्वल नेता हैं। मुजफ्फरपुर में इंसेफलाइटिस (चमकी बुखार) से सैकड़ों बच्चों की मौत, लू से मौतें, बाढ़ के कहर से कराहते लोग, स्वास्थ्य सेवाओं में कमजोरी दर्शाता राज्य सरकार का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, मुजफ्फरपुर का शेल्टर होम कांड और भागलपुर का सृजन घोटाला और ताजातरीन कोरोना महामारी पर नियंत्रण में राज्य सरकार की विफलता तेजस्वी यादव के लिए या समूचे विपक्ष के लिए जनता के बीच सरकार के खिलाफ बोलने के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। तबलीगी जमात से कोरोना फैलने के भाजपा के आरोपों के कारण माइनारिटी क्नीलास तीश से मुंह मोड़ सकता है। नये वोटर तेजस्वी के तेवर पसंद करने लगे हैं। शायद इसीलिए नीतीश जी उन्हें जंगल राज का पाठ पढ़ा रहे हैं। बिहार की राजनीति में बाहर से लौटे प्रवासी मजदूर बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। अगर चुनाव तक वे टिके रहे तो वे नीतीश व भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं। इसलिए कि लाकडाउन की परेशानियों से जिस कदर उन्हें रूबरू होना पड़ा है, उसे भूल पाना उनके व परिजनों के लिए आसान नहीं होगा। शायद यही वजह रही कि गृह मंत्री  अमित शाह को सफाई देनी पड़ी कि कोरोना काल में सरकार से गलतियां हुई होंगी, वे स्वीकार करते हैं, लेकिन विपक्ष ने तो कुछ नहीं किया। बहरहाल चुनाव में समय कम है और सच्चाई सामने आ जाएगी।

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