प्रवासी मजदूरों को बीच मंझधार में छोड़ना महंगा पड़ेगा

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प्रवासी मजदूरों को बीच मंझधार में छोड़ना महंगा पड़ेगा। बता रहीं हैं पल्लवी प्रकाश
प्रवासी मजदूरों को बीच मंझधार में छोड़ना महंगा पड़ेगा। बता रहीं हैं पल्लवी प्रकाश
  • पल्लवी प्रकाश

प्रवासी मजदूरों को बीच मंझधार में जिस तरह से सबने छोड़ दिया गया है, वह हम सबको बहुत महंगा पड़ेगा। उनके यागदान को नकारा नहीं जा सकता। मुंबई में तो यूपी-बिहार के कामगरों ने ही अर्थव्यवस्था की कमान संभाली हुई थी। इनके श्रम पर यह शहर चल रहा था।

मैंने जितने भी टैक्सी या औटोवालों से बात की है, सभी यूपी-बिहार के ही थे। मेरे घर बर्तन-खाने के लिए हेल्प बिहार की थी, बोरीवली में जिस सब्जीवाले से मैं सब्जी खरीदती थी, वह भी बिहार का ही था, यूनिवर्सिटी में आये दो नए गार्ड भी बिहार के ही थे। सोसायटी में चार गार्ड यूपी के थे। ऑटोवाले भी इन्हीं जगहों के कई सारे मिले।

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इन सब की आँखों में एक सपना होता था, बेहतर जीवन का। गाँव में इन्हें खाने भर का तो मिल जाता था, क्योंकि अपनी जरूरत भर का सब उपजा लेते हैं, लेकिन उससे आगे यानी बच्चों की पढाई-लिखाई, रोजगार का सोच कर ये सब इस महानगर में आये थे। उस सब्जीवाले की आँखों में एक चमक होती थी, जब वह मुझसे बात करता था, बताता था कि बेटे का एडमिशन बी.कॉम में कराया है, उसे CA बनाना है।

हेल्प बताती थी कि भाभी, यहाँ इतने पैसे मिल जाते हैं कि कुछ पैसे हर महीने गाँव भी भेज पाते हैं हमलोग। आज जब तन-मन से जर्जर होकर इस शहर को छोड़ कर प्रवासी मजदूर पैदल सड़कों पर चले जा रहे हैं तो मन कहीं न कहीं खुद को अपराधी मान रहा है। इसके बावजूद कि नौकरीपेशा वर्ग की सैलरी में कटौती की जा रही है। इस आपदा से निबटने के लिए इतने सारे चैरिटेबल ट्रस्ट सामने आ रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि ये प्रवासी इस तरह भगवान भरोसे अपने-अपने गाँवों के लिए पैदल ही सड़कों पर निकल पड़े हैं?

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प्रवासी मजदूरों के भरोसे को गहरी ठेस लगी है और अब उनका वापस लौट कर आना नामुमकिन सा लग रहा है। जिनके लिए राहत इकट्ठा की जा रही है, वाकई में उन्हें कितनी राहत मिल रही है? शायद इसी स्थिति के लिए दुष्यंत कुमार ने कहा था- यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ, मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

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