पुरुलिया में 2019 की पुनरावृत्ति होगी या 2016 की, दिलचस्प जंग

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बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद दो दिनों से हिंसा का दौर आज भी जारी रहा। इस हिंसा में अब तक भाजपा समर्थक 6 लोगों की जान जा चुकी है।
बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद दो दिनों से हिंसा का दौर आज भी जारी रहा। इस हिंसा में अब तक भाजपा समर्थक 6 लोगों की जान जा चुकी है।
  • डी. कृष्ण राव

पुरुलिया (बंगाल)। पुरुलिया में 2019 की पुनरावृत्ति होगी या 2016 की, देखना दिलचस्प होगा। जल, जंगल, जमीन और उद्योग  ये 4 मुद्दे हैं इस बार पुरुलिया के। पुरुलिया संस्दीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 9 विधानसभा क्षेत्रों में 27 मार्च को वोट पडेंगे। भौगोलिक  कारणों से झारखंड से सटे बंगाल के  इस जिले में  साल के 9 महीने  पीने के पानी के काफी किल्लत रहती है। खेती के लिए पानी तो दूर की बात है, पीने के पानी के लिए भी लोग तरसते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में  इन 9 सीटों मे  से 8 सीटों पर  राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को भाजपा ने पीछे छोड़ दिया था। तभी से तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को  यह समझ में आ गया था कि पानी के बिना पुरुलिया में वोट पाना मुश्किल है।

प्रशासन के लोगों ने  प्रधानमंत्री पानी परियोजना पर काम भी शुरू कर दिया था, लेकिन  कट मनी के खेल ने  परियोजना पर पानी फेर दिया और वह पूरी नहीं हो सकी। इसी का जिक्र देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी हर सभा में कर रहे हैं। वे भाजपा की सरकार  बनते ही पुरुलिया में हर घर तक पानी पहुंचाने का वादा कर रहे हैं। राज्य के पश्चिमी अंचल के विकास लिए जिम्मेवार मंत्री शांतिराम  महतो, जो पिछले लोकसभा  चुनाव में  अपनी  सीट बलरामपुर विधानसभा  क्षेत्र में  भाजपा के  उम्मीदवार से 35000 वोटों से पिछड़ गए थे, वह भी मान रहे हैं कि पानी इस बार सबसे बड़ा  मुद्दा है।

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काशीनाथ  महतो,  जोगेश्वर मुर्मू का मानना है कि  दिन-ब-दिन जंगल पर आदिवासी अपना अधिकार खो रहे हैं। इस अधिकार  से वंचित होने के कारण आदिवासियों की अपनी  स्वतंत्रता भी खोती जा रही है। पिछले दो दशक में  माओवादियों ने आदिवासियों को  उनके जंगल और जमीन लौटाने के  लिए लड़ाई तो की, लेकिन  उस लड़ाई ने अंत तक अपनी दिशा खो दी।

पाड़ा और रघुनाथपुर  विधानसभा क्षेत्रों के विभिन्न  स्थानों में दो दशक पहले से  उद्योग के  लिए आम लोगों से जमीन ले ली  गयी। उद्योग लगना तो दूर की बात, अपनी रोजी-रोटी की लड़ाई के लिए उन्हें पड़ोसी राज्य झारखंड जाना पड़ता है। इसको लेकर भी लोगों में काफी   गुस्सा है।

सीपीएम के जिला सचिव  प्रदीप राय का कहना है  ममता बनर्जी ने लोगों का गुस्सा शांत करने के लिए वोट ऑन अकाउंट में बलरामपुर में  नया उद्योग स्थापना के लिए एक सौ करोड़ रुपये का प्रावधान किया है,  जो एक सफेद झूठ साबित हो रहा है। उनका यह भी मानना है कि  पुरुलिया के भूमि पुत्रों को बाहर जाकर काम करना पड़ता है। स्वास्थ्य, शिक्षा समेत सभी सरकारी नौकरियों में  कोलकाता  व अन्य शहरों से यहां लोग  भरे जा रहे हैं, लेकिन यहां के लोगों को मौका नहीं मिलता।

बलरामपुर  विधानसभा एक समय  सीपीएम का गढ़ रहा, लेकिन धीरे-धीरे  कब “वाम” का वोट “राम” में आ गया, सीपीएम को पता ही नहीं चला। पिछले लोकसभा चुनाव में  इस सीट पर ही नहीं, बल्कि पूरा पुरुलिया जिला ही भगवा हो गया था। बलरामपुर में भाजपा के उम्मीदवार 35 हजार से ज्यादा वोटों से आगे थे।

इस बार यहां से लड़ रहे हैं राज्य के मंत्री शांतिराम महतो ने मनरेगा से लेकर सरकारी कामों की लंबी लिस्ट गिनायी, लेकिन वह बातचीत से खुद ही कॉन्फिडेंट नहीं लग रहे रहे थे। उनका कहना है कि  इस बार अगर संयुक्त मोर्चा सीपीएम का पुराना  वोट खींचने में कामयाब होती है तो बलरामपुर की लड़ाई देखने लायक होगी। शांतिराम के खिलाफ इस बार भाजपा के उम्मीदवार हैं  बालेश्वर महतो। बालेशवर एक साधारण  किसान हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री का हाथ उनके ऊपर है  और विकास भाजपा का एजेंडा है। उनको इस सीट पर जीत आसान दिख रही है।

अब चलते हैं बांधोंयान। यहां से सीपीएम सात सात बार चुनाव जीती है। 2011 में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार राजीव लोचन सौरेनी ने सीपीएम के उम्मीदवार सुशांत बहरा को  20307 वोटों से हराया था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में  भाजपा के उम्मीदवार इस सीट से 10 हजार से भी ज्यादा  मतों से आगे थे। राजीव लोचन का कहना है कि  यह विधानसभा क्षेत्र एक समय  माओवादियों का गढ़ था। ममता बनर्जी ने लोगों को माओवादियों के  हाथ से बचाया। इसलिए लोग जरूर तृणमूल को  वोट देंगे। लेकिन भाजपा उम्मीदवार पारसी मुर्मू का कहना है कि  विकास के नाम पर  यहां कुछ काम नहीं हुआ। शस्त्र छोड़े माओवादियों  को जो सरकारी सहायता मिलनी चाहिए थी, काफी लोगों को वह भी नहीं मिली। इससे लोग गुस्से में हैं। ऊपर से पानी की समस्या है।

मानबाजार विधानसभा क्षेत्र में 2019 के लोकसभा इलेक्शन में  तृणमूल का उम्मीदवार भाजपा के उम्मीदवार से आगे था। यह पुरुलिया की 9 में से एकमात्र सीट थी, जहां तृणमूल उम्मीदवार भाजपा से आगे था। 2016 में  इस सीट से तृणमूल कांग्रेस ने लगभग 11 हजार मतों से सीपीएम को हराया था, लेकिन 2019 में  सीपीएम का पूरा  वोट भाजपा में  चला गया और  सीपीएम का ग्राफ नीचे  आ गया। इस सीट में लगभग 97%  रूरल एरिया है। यहां के लोग  झारखंड के  अलावा दूसरे राज्यों में काम करते हैं। लॉकडाउन के समय यहां के लोग काफी मुसीबतों से गुजरे। यहां से बीजेपी उम्मीदवार गौरी सिंह सरदार  के साथ टीएमसी की संध्या रानी टुडू का  सीधा मुकाबला है। तृणमूल उम्मीदवार का कहना है कि  लॉकडाउन के समय वह लोगों के घर घर पहुंचे। सहायता की, लेकिन बीजेपी प्रत्याशी गवरी सिंह सरदार  काफी कॉन्फिडेंट हैं कि उन पर मोदी जी का हाथ है।

जयपुर विधानसभा क्षेत्र एक समय कांग्रेस का शक्तिशाली गढ़ था। कांग्रेस इस सीट से चार बार चुनाव जीती, जबकि फॉरवर्ड ब्लॉक का दो बार इस सीट पर कब्जा रहा। हाल में सीट  तृणमूल कांग्रेस के पास है। इस बार टेक्निकल कारण से  चुनाव आयोग की ओर से  तृणमूल के ऑफिशियल उम्मीदवार का  नामांकन नामंजूर कर दिया गया। इस सीट से भाजपा के उम्मीदवार नरहरी  महतो का कहना है कि  कांग्रेस और  वाम मोर्चा का  वह दबदबा अब नहीं रहा। तृणमूल कांग्रेस आपसी कलह में इतनी फंसी हुई है कि ऑफिशियल कैंडिडेट का नामांकन नामंजूर होने के बाद  एक निर्दलीय का तृणमूल समर्थन कर रही है। इससे तृणमूल का एक तबका काफी गुस्से में है। इस क्षेत्र में 12% एससी और इतनी संख्या में एसटी वोटर हैं।

स्थानीय विमल माजी का कहना है कि पुरुलिया की हर सीट की तरह यहां भी 85 से 90% मतदान होता है। लोग हर  चुनाव में ही सपना देखते हैं कि पुरुलिया का कुछ डेवलपमेंट होगा। सीपीएम, तृणमूल कांग्रेस ने तो कुछ नहीं किया, अब हमें कुछ और सोचना होगा।

जिले की एकमात्र शहरी सीट है पुरुलिया। यहां भी बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है। इस सीट से तृणमूल के कई सारे दावेदार थे, लेकिन आखिर  तृणमूल के जिला अध्यक्ष  सुजय बनर्जी को टिकट मिल गया। इसके बाद से  जिला तृणमूल कांग्रेस में  अंदरूनी कलह चल रहा है। उम्मीदवार का खुद कहना है  कि चिंता भाजपा को लेकर नहीं है, पार्टी के  विभीषणों को लेकर हैं। यहां से भाजपा उम्मीदवार सुदीप  मुखर्जी हैं, जिन्हें लोग दल बदलू के नाम से जानते हैं। माकपा,  कांग्रेस, तृणमूल होते हुए अब भाजपा में हैं। 2016 के विधानसभा चुनाव में यहां से तृणमूल उम्मीदवार  लगभग 12 हजार वोटों से  जीता था, लेकिन 2019 में उतना ही वोटों का घाटा हुआ था। अब इस सीट पर  दोनों पक्ष कांग्रेश पर ही निर्भर करते हैं।

झारखंड से सटे  पहाड़ा और रघुनाथपुर  विधानसभा क्षेत्र का एकमात्र मुद्दा है  उद्योग। वाम मोर्चा के समय  यहां की हजार-हजार एकड़ जमीन उद्योग के नाम पर ली गयी थी। ममता बनर्जी उसी जमीन पर उद्योग स्थापना की बात कह कर सत्ता में आई थीं, लेकिन आज तक वह जमीन बंजर ही पड़ी हुई है। यहां के  रामनाथ  का कहना है कि  अपनी जमीन पर अगर उद्योग लगता तो  हमारे बच्चे बाहर काम करने नहीं जाते। जमीन भी गयी  और नौकरी भी नहीं मिली। लोगों का कहना है कि  वाममोर्चा और तृणमूल को  देख चुके हैं, अब थोड़ा दूसरे को भी देख लिया जाये। लोगों में राज्य  सरकार के प्रति इतना  गुस्सा है कि  अगर भाजपा अपने अंदरूनी कलह से बच जाये तो इस सीट से बाजी मारना असंभव नहीं है।

यहां विधानसभा की  लड़ाई  सीधे-सीधे भाजपा के अंदर की है। यहां  भाजपा का समर्थक होने के अपराध में  त्रिलोचन  महतो को  तृणमूल के लोगों ने  मौत के घाट उतार दिया था। उसी त्रिलोचन  का भाई विवेकानंद टिकट  का दावेदार था, लेकिन पार्टी ने उसे टिकट नहीं दिया।  शुरू-शुरू में काफी  गुस्सा था, लेकिन प्रधानमंत्री के मुंह से  त्रिलोचन का नाम सुनने के बाद  विवेकानंद शांत हो गए हैं। कहने लगे कि  पार्टी को जिताना ही मूल उद्देश्य है।

पुरुलिया में 9 विधानसभा क्षेत्र हैं। 27 मार्च को वोट होना है। 20 लाख वोटर अपने मत का प्रयोग करेंगे। 2016 के विधानसभा चानव में तृणमूल कांग्रेस ने 7 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को 2 सीटें मिली थीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 8 सीटों पर बढ़त थी, जबकि तृणमूल कांग्रेस महज एक सीट पर आगे रही थी।

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