पाकिस्तान की सियासतः इमरान खान और बलूचिस्तान 

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  • के विक्रम राव

गेंदबाज, अब सियासतदा खान मोहम्मद इमरान खान ने संसददीय चुनाव जीतते ही कश्मीर और बलूचिस्तान का एक साथ उल्लेख किया। भारत के लिए यह भली बात है। बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अन्दरूनी मसला भारत मानता रहा है, भले ही पाकिस्तान कश्मीर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण करता आया हो। बलूच जनता के साथ भारत की यह कृतघ्नता है।

पाकिस्तान के सरकारी अभिलेखों के अनुसार  अंग्रेजों के पलायन के पश्चात आजाद भारतीय संघ में बलूचिस्तान रहना चाहता था, जैसे पश्चिमोत्तर प्रांत में सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान के पठान अनुयायी। बलूच गांधी और स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल समद खान अचकजाई के नेतृत्व में बलूच सत्याग्रही महात्मा गांधी के आंदोलन में सक्रिय रहे।

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भौगोलिक दूरी के कारण, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं की सत्ता प्राप्ति की जल्दबाजी से, बलूचिस्तान भारत से कट गया। भौगोलिक कारणों से जुड़ना संभव नहीं हो पाया था। अतः पाकिस्तान के विरूद्ध बलूच जनता अपने स्वतंत्र गणराज्य का संघर्ष चलाती रही। जवाब में मोहम्मद अली जिन्ना ने थल और वायुसेना भेजकर (27 मार्च 1948) राजधानी क्वेटा पर कब्जा कर लिया। रियासतों के सारे नवाबों, खासकर कलाट के नवाब मीर अहमद यार खान ने, जिन्ना के विलय प्रस्ताव पर दस्तखत करने से इन्कार कर दिया था। स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना इस दमन प्रक्रिया का दिग्दर्शन करने क्वेटा गये। मगर गंभीर रूप से वहाँ बीमार पड़ गये और कराची लौट आये। उसी हफ्ते उनका निधन हो गया। बलूच विद्रोह को पाकिस्तानी वायुसेना ने कुचल दिया था।

उसी समय उधर कश्मीर घाटी के तब के जननायक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और डोगरा महाराजा हरि सिंह (सांसद कर्ण सिंह के पिता) ने विलय संधि पर हस्ताक्षर कर अपनी रियासत को भारत में शामिल कर दिया था। भौगोलिक विडम्बना है कि स्वेच्छा से भारतीय संघ में आया कश्मीर तीन बार पाकिस्तानी सेना को परास्त करने के बाद भी विश्व मंच पर विवाद के रूप में अक्सर उठता रहा, जबकि निरन्तर नरसंहार भुगतने के बावजूद बलूचिस्तान की आजादी और मानवाधिकार का मसला दबा ही रहता गया।
निर्वासित नेता खान वाहिद बलोच, जो उत्तरी अमरीकी बलूच संघ के सदर हैं, ने मांग की कि अब भारत को पाकिस्तानी फौज के अमानुषिक कृत्यों को दुनिया में उजागर करना चाहिए। वाहिद बलोच ने भारत सरकार के समक्ष एक सुझाव रखा था : कि देर से सही अब अंहिसावादी भारत इंसानियत के नाम पर बलूच मजलूमों का साथ दे। ऐतिहासिक दर्रा बोलन, जहाँ से विदेशी लोग भारत प्रवेश करते रहे, से सटे हुये बलूचिस्तान का भारत वैसे ही मदद करे जैसे उसने पंजाबी-शासित पश्चिमी पाकिस्तानी तानाशाहों के विरूद्ध बंगभाषी पूर्वी पाकिस्तानियों की सहायता की थी। कश्मीर के संदर्भ में बलूचिस्तान को देखकर यकीन हो जाता है कि भूगोल से भारत प्रवंचित हो गया। वार्षिक राष्ट्रीय बजट से कश्मीर की सुरक्षा और विकास के लिए अरबों रूपये खर्च होते है। राजकोष पर सालाना भार बढ़ता जा रहा है, सीमापार आतंकवाद के कारण। इस हिमालयी वादी से राजस्व नगण्य है। मगर बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर पाकिस्तान अरबों डालर कमा रहा है।
यह क्षेत्र देश का ”फल उद्यान“ कहलाता है। यहां के सूयी नामक भूभाग से प्राकृतिक गैस देश के उपभोक्ताओं को पचास वर्षो से मिलती रही है मगर स्थानीय जन को कुछ ही अरसे  से  मुहय्या की जा रही है। यहां यूरेनियम, सोना और तेल का भण्डार है मगर यात्रियों को राजमार्गों पर चिलचिलाती धूप से केवल बिजली के खम्भों से ही छाया प्राप्त होती है। शिक्षा का आलम यह है कि महिला साक्षरता बासठ वर्ष बाद भी केवल एक प्रतिशत है। पूरे पाकिस्तानी साक्षरता प्रतिशत में बलूचिस्तान निम्नतम है। यहां के कालीन निर्माता पड़ोस के (पूर्व सोवियत) तुर्कमान गणराज्य में बस गये क्योंकि यहाँ उन्हें प्रगति का मौका नहीं मिला। मशहूर ढाके की मलमल की भांति, बलूची कालीन भी विश्व विख्यात रहे। इस्लामी जम्हूरिया का यह सर्वाधिक उपेक्षित प्रान्त अब पाकिस्तानी सरकार द्वारा कम्युनिस्ट चीन के उपनिवेश के रूप में बनाया जा रहा है। हवेलियाँ- काशगर रेल लाइन का निर्माण कर पाकिस्तान चीन को अपने इस्लामी इलाके शिंजिंयांग के उइगर मुसलमानों को दबाने के लिये बलूचिस्तान को उपयोग हेतु दे रहा है।
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उधर ग्वादर बन्दरगाह का निर्माण अब चीन कर रहा है ताकि भारत, बर्मा और मध्येशियाई गणराज्यों को आर्थिक रूप से घेरा जाय। अतः जब भारत-पाक रिश्तों पर कभी विश्लेषण हो तो याद रखना होगा कि केवल भारतीय कश्मीर के चीन अधिकृत क्षेत्र में काराकोरम पाक-चीन राजमार्ग पर ही चिन्ता व्यक्त करने से हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। ग्वादर बन्दरगाह पर चीनी नौ सेना के नियंत्रण से भी बलूचिस्तान के भूभाग से वे भारत पर शिकंजा कस रहें हैं। पहले कश्मीर, बर्मा, श्रीलंका, पूर्वोत्तर राज्यों तथा बाग्लादेश में बढ़ते चीनी प्रभाव से भारत त्रस्त रहता रहा है। अब बलूचिस्तान का नया मोर्चा खुल रहा है। सांसदों को इस विषय पर बहस करनी चाहिए।
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