परंपरागत मीडिया को रेवेन्यू शेयर करे गूगल, सुशील मोदी ने की मांग

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कैंसर के इलाज के लिए मुजफ्फरपुर में 100 बेड का अस्पताल बनेगा। केंद्र सरकार ने अस्पताल बनाने की  मंजूरी जमीन मिलने पर पहले ही दे दी है।
कैंसर के इलाज के लिए मुजफ्फरपुर में 100 बेड का अस्पताल बनेगा। केंद्र सरकार ने अस्पताल बनाने की  मंजूरी जमीन मिलने पर पहले ही दे दी है।

पटना। परंपरागत मीडिया को गूगल अपने रेवेन्यू से शेयर दे। गूगल-फेसबुक दूसरे के न्यूज कंटेंट अपने प्लेटफार्म पर डिस्प्ले कर विज्ञापन के माध्यम से पैसा कमाते हैं। पारंपरिक मीडिया की हालत खराब है, जो भारी भरकम खर्च कर न्यूज कंटेंट जुटाते हैं और पाठकों को परोसते हैं। राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार मोदी ने बुधवार को शून्यकाल में देश के प्रिंट मीडिया, न्यूज ब्राडकास्टर्स व न्यूज चैनल को भारी संकट के दौर से गुजरने का मुद्दा उठाते हुए भारत सरकार से आस्ट्रेलिया के समान कानून बनाने की मांग की, ताकि गूगल आदि को विज्ञापन राजस्व शेयर करने के लिए बाध्य कर यहां के प्रिंट और न्यूज टीवी चैनल आदि को आर्थिक संकट से उबारा जा सके।

मोदी ने कहा कि मीडिया घराने समाचार संकलन करने, उसकी सच्चाई का पता लगाने और लोगों तक सटीक जानकारी देने के लिए पत्रकारों, रिपोर्टर्स, एंकर्स, कैमरामैन, आफिस आदि पर अरबों रुपये खर्च करते हैं। इनकी आमदनी का मुख्य स्रोत विज्ञापन है। परंतु हाल के वर्षों में यूट्यूब, फेसबुक, गूगल जैसी कम्पनियों के पास विज्ञापन का बड़ा हिस्सा चला जाता है। ये मीडिया के बनाए न्यूज कंटेंट को आने प्लेटफार्म पर डिस्प्ले कर इसमें विज्ञापन के माध्यम से पैसा कमाते हैं।

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गूगल, फेसबुक आदि बिना खर्च किए दूसरे के बनाए न्यूज कंटेंट को अपने प्लेटफार्म पर दिखला कर पैसा कमा रहे हैं और परम्परागत मीडिया विज्ञापन की आय से वंचित हो रहा है। आस्ट्रेलिया की सरकार ने न्यूज मीडिया बारगेनिंग कोड कानून बना कर गूगल को रेवेन्यू शेयरिंग के लिए बाध्य किया है। आस्ट्रेलिया की तर्ज पर फ्रांस और अनेक देशों ने कानून बनाने की पहल की है। भारत सरकार ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए इंटरमीडियरी रूल्स नोटिफाई (Intermediary Rules Notify) किया है। विज्ञापन के रेवेन्यू शेयरिंग के लिए भी कानून बनाना चाहिए।

निजीकरण का हौवा खड़ा करने वाले अपने गिरेबां में झांकें

सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि निजीकरण का हौवा खड़ा करने वाले पहले अपने गिरेबां में झांकें। जो राहुल गांधी संसद के संयुक्त अधिवेशन में स्मार्ट फोन पर लगे दिखते हैं, लोकसभा में बहस के दैरान आंख मारने जैसी हरकत करते हैं और आलू से सोना बनाने की बात करते हैं, उन्हें अर्थव्यवस्था की समझ होती, तो वे न विनिवेश नीति पर  सवाल उठाते, न बैंकों के निजीकरण का हौव्वा खड़ा करते।

राहुल गांधी यदि इन मुद्दों पर गंभीर हैं, तो बतायें कि यूपीए के शासन काल में अमीरों को फोन कॉल पर करोड़ों के कर्ज कैसे मिल जाते थे? क्या कांग्रेस अपने कार्यकाल की उस बैंकिंग व्यवस्था पर श्वेतपत्र जारी करेगी, जिससे गरीबों-युवाओं को बाहर रखा गया था?

मोदी ने पूछा कि राहुल गांधी बतायें कि क्या यूपीए सरकार ने एक निजी विमान कंपनी को घाटे से उबारने की फिक्र नहीं की थी? उस विजय माल्या और ललित मोदी को किसने पैदा किया था, जिन पर बाद में एनडीए सरकार ने शिकंजा कसा, उनकी करोड़ों की सम्पत्ति जब्त की और अब उनके प्रत्यर्पण में लगी है? यूपीए ने सरकारी बैंकों को भ्रष्टाचार के राष्ट्रीयकरण का औजार बना कर खोखला कर दिया था।

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