धरना-प्रदर्शन से बनी केजरीवाल सरकार फिर धरना पर

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फरवरी 2015 में दिल्ली की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ आम आदमी पार्टी को सत्ता सौंपी थी। पांच वर्षों के कार्यकाल में तीन वर्ष से अधिक निकल चुके हैं। इस अंतराल में शायद ही कोई दिन बीता हो,जब आम आदमी पार्टी का एलजी अथवा केन्द्र सरकार के साथ टकराव नहीं हुआ हो। पहले नजीब जंग और अब अनिल बैजल। कभी अफसरों की कार्यशैली को आधार बना कर, तो कभी कुछ और कारण बता कर केजरीवाल और उनके मंत्री एलजी से उलझते रहते हैं। केन्द्र सरकार को लेकर भी उनका रवैया कुछ ऐसा ही रहता है। कह सकते हैं कि अपने वर्तमान शासनकाल में शायद ही कोई दिन ऐसा निकला हो, जब केजरीवाल सरकार ने केन्द्र सरकार पर स्वयं को परेशान करने का आरोप नहीं लगाया हो। दिल्ली सरकार और केन्द्र सरकार के बीच तनातनी की खबरों से दिल्ली के लोग तंग आ चुके हैं। आज स्थिति यह है कि उन्हें अब यह जानने में तनिक दिलचस्पी नहीं रह गयी है कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ।

आधी रात को मुख्यमंत्री आवास में मुख्य सचिव के साथ मारपीट का जो वाकया हुआ था, उसके बाद से तो जनसामान्य में यह संदेश चला गया कि उनसे केजरीवाल को समझने में बड़ी चूक हो गयी है। दरअसल, आम आदमी पार्टी की शैली अब लगभग बेपर्द हो चुकी है। लेकिन, धरना पॉलिटिक्स में महारथ हासिल कर रखे केजरीवाल अपने मंत्रियों के साथ धरने के लिए एलजी दफ्तर के अंदर धावा बोल देंगे, इसका इल्म किसी को नहीं था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अपने तीन मंत्रियों के साथ पिछले हफ्ते भर से एलजी आवास में विजिटिंग रूम में धरने पर बैठे हैं। सोफे पर लेटे मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों की तस्वीर हैरान करनेवाली है। लोकतंत्र में अपनी बात रखने का हर किसी को अधिकार है। लेकिन, विरोध के नाम पर इस तरह के पैंतरे को कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन कहते हैं, ‘दिल्ली के उपराज्यपाल हमारे लिए चार मिनट का समय नहीं निकाल पा रहे हैं।’ क्या खूब कहा जैन साहब ने- एक तरफ तो  उन्होंने एलजी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, वह भी उनके घर में…और अब उन्हीं से मिलने का समय भी मांग रहे हैं। तनिक विचारने की बात है कि यदि एलजी से मिलना ही था, तो फिर उनके घर जाकर पैंतरे दिखलाने की क्या जरूरत थी। असल में केजरीवाल मान कर चल रहे थे कि हमेशा की भांति इस बार भी उनका दांव फिट बैठ जायेगा…मीडिया 24 घंटे उनके धरने की खबर दिखायेगा…और बड़ी आसानी से एक बार फिर उनकी पब्लिसिटी हो जायेगी। लेकिन, ऐसा कुछ भी हो नहीं पाया। अलबत्ता, दांव ही उल्टा पड़ने लगा। बाध्य होकर सम्मान बचाने के लिए अब केजरीवाल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखनी पड़ी है। केजरीवाल ने पीएम को चिट्ठी लिख अफसरों की हड़ताल खत्म कराने की अपील की है। यहां विचारनेवाली बात यह है कि केजरीवाल स्वयं प्रशासनिक अधिकारी रह चुके हैं। बावजूद इसके विचित्रता यह है कि उनकी अधिकारियों से बिलकुल नहीं पटती। कभी प्रधानमंत्री पर आरोप लगाना, कभी गृह मंत्रालय पर परेशान करने की बात कहना, बात-बात पर एलजी को दोषी ठहरा देना…आखिर यह सब क्या है? दिल्ली की जनता इन सब से आजिज हो चुकी है। अरविन्द केजरीवाल को उसने सत्ता इसलिए नहीं सौंपी थी कि राज्य सरकार केवल केन्द्र सरकार से लड़ती रहे। यह सही है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं है। लेकिन, इसी व्यवस्था में दिल्ली में शीला दीक्षित ने 15 वर्षों तक शासन किया। यद्यपि, आम आदमी पार्टी समय तो बहुत गंवा चुकी है। लेकिन, अब भी यदि वह सही ट्रैक पर लौट आती है, तो सम्भव है, अगले चुनाव में उसकी लाज बच जाये ; अन्यथा संकेत तो अच्छे नहीं मिल रहे।

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  • विष्णु शंकर उपाध्याय
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