देश में घुसपैठ की अब और अनदेखी संभव नहीं है

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  • राजीव सिंह
असम में अवैध नागरिकों की समस्या को सांप्रदायिकता का चश्मा उतारकर देखने की जरूरत है। इन शरणार्थियों या अवैध घुसपैठियों में हिंदू-मुस्लिम दोनों है। इनकी संख्या 1971 कटआफ वर्ष मानकर 40 लाख आंकी गई है। लेकिन असम की यह समस्या इससे भी पुरानी है। इसी वजह से देश में पहली जनगणना के तुरंत बाद असम में 1951 में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार करने की जरूरत महसूस हुई।
कोर्ट में एक मामला अभी भी उलझा हुआ है जिसमें 1971 को कटआफ वर्ष मानने को चुनौती दी गई है। यह तारीख यदि पीछे गई तो जाहिर है करीब सवा तीन करोड़ की आबादी में अवैध लोगों की संख्या 40 लाख से भी ज्यादा होगी। अपने हित के लिये हर राजनीतिक दल इस समस्या को 1951 के बाद से अपनी जरूरत के अनुसार उठाते रहे है।
सुप्रीम कोर्ट के 2009 में इस मसले पर दखल के बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का अपडेटेड मसौदा तैयार करने की पहल हुई। अब जब खुद सभी राजनीतिक दल इस समस्या को असम की पहचान का संकट बताकर समय-समय पर उठाते रहे हैं तो इस बेहद संवेदनशील और जटिल मसले पर मिल कर समस्या का हल करने के लिये आगे क्यों नहीं आते है। असम में यदि बाहर से आए लोगों की आबादी के आंकड़ों पर यदि नजर डाली जाए तो वास्तव में हालात भयावह है। इस वजह से वहां कई नरसंहार हो चुके है।
बांग्लादेशियों की घुसपैठ को नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिये कि इस भयावह समस्या का हल उत्तेजक और भड़काने वाले बयान भी नहीं है। जमीनी स्तर पर इससे कैसे निपटेंगे यह ठंडे दिमाग से सोचने और बेहद सावधानी से हल करने की जरूरत है। क्योंकि आने वाले दिनों में यह समस्या देश के शायद अब तक के सबसे विकट संकट के रूप में सामने आने वाली है और इसका असर देश के दूसरे हिस्सों पर भी आएगा। आज ठीक संसद के बाहर सड़क पर केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे और एक कांग्रेसी सांसद प्रदीप भट्टाचार्य के बीच जिस तरह से शर्मनाक तीखी जबानी जंग इस समस्या पर हो रही थी उससे तो यही लगता है कि मामले को गरमा कर सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने पर ही ज्यादा जोर है। लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि अब इस समस्या से कोई मुंह नहीं मोड़ सकता है। घुसपैठ का हल तो निकालना ही होगा।
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