टीनएजर प्यार की मासूमियत भरी कहानी है धड़क

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समरस होना ही समर्थ या सामर्थ्यवान भारत की पहचान है। समरसता से मिली ताकत के कारण ही भारत जगत गुरु कहलाया और यही ताकत उसे और आगे ले जाएगी।
समरस होना ही समर्थ या सामर्थ्यवान भारत की पहचान है। समरसता से मिली ताकत के कारण ही भारत जगत गुरु कहलाया और यही ताकत उसे और आगे ले जाएगी।
  • नवीन शर्मा
निर्देशक शशांक खेतान की धड़क किशोरवय प्रेम युगल के निश्छल प्रेम की दास्तान है। श्रीदेवी की बेटी जहान्वी कपूर अपनी पहली फिल्म में अपनी मासूमियत व ताजगी से लुभाती हैं । वे उदयपुर के राजपरिवार की बेटी की भूमिका में जंची हैं। वो अपनी मां जैसी खूबसूरत नहीं हैं और ना ही उनके जैसी बोलती आंखें जहान्वी ने पाई हैं, वे उनके जैसी शानदार डांसर भी नहीं हैं। इसके बावजूद वे फोटोजेनिक हैं कैमरे का सामना सहज रूप में करती हैं। प्रेमी बने इशान खट्टर की ये दूसरी फिल्म है वे युवा प्रेमी की भूमिका में अच्छे लगते हैं। उसका भोलापन और बेबसी दर्शकों को उससे कनेक्ट करती है।
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी सिनेमोटोग्राफी है। इसमें झीलों के शहर उदयपुर की खूबसूरती आंखों को भा जाती है। राजस्थानी बोली और तहजीब की भी हल्की सी झलक इसमें दिखती है।
दो गीत भी अच्छे लगते हैं अभिनय के मामले में आशुतोष राणा सब पर भारी पड़ते  हैं। वो जहान्वी के पिता रतन सिंह की भूमिका में जान डाल देते हैं। कई दृश्यों में बिना बोले अपने गुस्से का इजहार सिर्फ आंखों से ही कर देते हैं। उन्हे अपनी बेटी का नीची जाति और कम हैसियत के परिवार के लड़के से प्रेम करना अपमानजनक लगता है ।वे पुलिस की मदद से उसे और उसके दोस्तों को मरवाने की कोशिश करते हैं। इसी दौरान पार्थवी बनी जहान्वी के साहस से जान बचा कर मुंबई भाग जाते हैं और वहां से कोलकाता।
फिल्म का क्लाइमेक्स स्तब्ध करने वाला है अपनी बेटी के पति और नाती की हत्या रतन सिंह करा देता है। ओनर किलिंग की ये कहानी कयामत से कयामत की भी याद दिला जाती है। ऩए चेहरों वाली प्रेम कहानियां थोड़ी से नएपन से बनाई जाती है तो हिट ही होती  हैं। ये फिल्म भी उसी में गिनी जाएगी।
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