झारखंड में भी राज्यपाल की भूमिका पर उठे थे सवाल

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बात झारखंड की है। सन 2005 में विधानसभा चुनाव हुए थे और एनडीए को 36 तथा कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन को 26 सीटें मिली थीं। राज्यपाल थे शिब्ते रज़ी साहब। उन्होंने शिबू सोरेन को सरकार बनाने का न्योता दिया और बहुमत साबित करने के लिए 19 दिनों की मोहलत भी दी। तब एनडीए सुप्रीम कोर्ट गई और कोर्ट ने बहुमत साबित करने की मियाद 48 घंटे कर दिया। शिबू सोरेन सरकार शहीद हो गई! कहने का अर्थ यह है कि राज्यपालों की भूमिका हमेशा केंद्र के इशारे पर ही निर्भर करती है। वह राज्यों में केंद्र सरकार का एजेंट होता है और वही करता है जो केंद्र सरकार चाहती है। बहुत कम राज्यपाल ऐसे हुए हैं जो अपने विवेक पर चले हों। कर्नाटक का खेल भी आशा के अनुरूप ही है।गोवा में भी यही हुआ था किंतु तब मनोहर परिकर कामयाब हो गए थे। वे गोवा के लोकप्रिय नेता हैं। कर्नाटक में जो ड्रामा चल रहा है उसका समर्थन कोई भी सचेत व्यक्ति नहीं करना चाहता। किन्तु इससे भी अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारा लोकतंत्र किस मुक़ाम पर पहुँच चुका है। कल जब येदुरप्पा शपथ ले रहे थे तो मुझे उनको देखकर दया आ रही थी। क्या सत्ता-सुख इतना बड़ा है, जिसके लिए मान-अपमान सब बेमानी हो जाते हैं?आग लगे ऐसे सत्ता-सुख में। मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मैं राजनीति में नहीं हूँ। कर्नाटक के राज्यपाल की हालत तो और भी अधिक हास्यास्पद थी! वे राज्यपाल के पद की गरिमा को भुलाकर अपने मालिकों के प्रति वफ़ादारी निभा रहे थे। मोदी या शाह वहाँ नहीं थे यही ग़नीमत रही। जब कर्नाटक की जनता ने खंडित जनादेश दिया तो भाजपा को इस गंदी राजनीति से अलग हो जाना चाहिए था। कम से कम भाजपा पर भरोसा करने वाले मुझ जैसे कुछ लोगों का मान रह जाता किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हो सकता है कि येदुरप्पा की हालत शिबू सोरेन जैसी ही हो जाए!आज सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाएगा। असल ग़लती तो कर्नाटक की जनता ने किया है। उसने अपने प्रखर विवेक का परिचय न देकर हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा दिया है। सबकी नजरें भविष्य पर टिकी हुई हैं!
संभावनाओं का खेल है राजनीतिः राजनीति विडंबनाओं का खेल है। मेरी नज़रों के सामने आज 1996 का वो दौर घूम रहा है जब वजुभाई वाला गुजरात प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे और एच डी देवेगौड़ा देश के प्रधानमंत्री, उस समय गुजरात में भाजपा शासित सुरेश मेहता सरकार को विश्वास का मत हासिल करना था, विधानसभा के फ्लोर पर विश्वास का मत हासिल करने के बावजूद केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर राज्यपाल कृष्णपाल सिंह ने गुजरात में कॉन्स्टिट्यूशनल क्राइसिस घोषित कर दिया और एच डी देवेगौड़ा की सरकार ने उस पर मोहर लगाकर गुजरात में राष्ट्रपति शासन की घोषणा करवा दी थी। आज 22 साल बाद दोनों किरदार वही हैं, वही वजुभाई वाला है–वही एच डी देवेगौड़ा की पार्टी है लेकिन आज बाज़ी कर्नाटक के राज्यपाल के रूप में वजुभाई वाला के हाथ में है।
तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान!
भीलन लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण।

  • डा. राजेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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