जयंती पर विशेषः तमस में उजियारे का नाम भीष्म साहनी

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  • नवीन शर्मा
भीष्म साहनी हिंदी साहित्यकारों में विशिष्ट स्थानीय रखते हैं। सात अगस्त 1915 को रावलपिंडी में इनका जन्म हुआ था। वे हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे।
मुझे साहित्य में गद्य पसंद है। उसमें भी उपन्यास और आत्मकथा पढ़ना ज्यादा रुचता है। भीष्म साहनी की आत्मकथा आज के अतीत में वे अपने जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों और जीवन यात्रा  के बारे में बेबाकी से लिखते हैं। भीष्म साहनी को मैं दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक तमस के लेखक के रूप में ही जानता था। तमस भारत के बंटवारे के बैकग्राउंड पर आधारित एक पठनीय  उपन्यास है। इस पर आधारित गोविंद निहलानी के धारावाहिक को मैं उन दिनों बड़े ध्यान से देखता था। इस धारावाहिक में ओम पुरी की इंटेस एक्टिंग ने बंटवारे के दौर में मचे सांप्रदायिक दंगों के भयानक और दिल दहला देने वाली सचाई को सामने रखा था।
आज के अतीत में भीष्म तमस की रचना प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। उन्होंने ये उपन्यास मुंबई के भिवंडी में दंगे के बाद लिखना शुरू किया था। यानि फिर से हुए सांप्रदायिक दंगे ने पुराने घाव को हरा कर दिया और पुरानी यादें कलम की स्याही के जरिए तमस की कथा में तब्दील होती चली गई। इस पुस्तक में उनके प्रसिद्ध नाटक हानूश की रचना प्रक्रिया विस्तार से बताई गई है। हम भीष्म साहनी की जिंदगानी को बड़े करीब से देखते चलते है। इसके साथ ही उस.दौर के समाज का भी  हाल जानते हैं। वहीं उस दौर में देश में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम की भी झलकियां भी सिलसिलेवार ढंग से एक फिल्म की मानिंद दिखती जाती हैं।
इस किताब की एक और खासियत है। भीष्म बड़ी बेबाकी और विस्तार से लेखक की भूमिका के बारे में लिखते हैं। वे कहते है कि कोई भी लेखक इस खुशफहमी में नहीं रहता कि उसकी रचनाएं दुनिया को बदल देंगी।दुनिया को सचेत करने की बात साहित्य में उठती रही है। महाभारत के रचियता व्यास ने भी बड़े फलक पर उस काल की गिरावट के ही दृश्य प्रस्तुत किए हैं।व्यास ने ये अपना दायित्व माना कि मैं यह दिखा दूं कि किस अघोगति तक उस दौर का समाज पहुंच चुका था। और साहित्य आज भी यही भूमिका निभा रहा है। लेखक का व्यक्तित्व स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है।वह नियम अधिनियमो से बंधा नहीं होता। मानवीय मूल्य ही उसका मार्गदर्शन करते हैं। साहित्य अंधकार को मिटा तो नहीं सकता पर इसकी प्रेरणा पाठक को दे सकता है कि अंधकार मिट सकता है। कोई भी लेखक नपे तुले लक्ष्य सामने रख कर रचना नहीं करता। वह अपनी किसी आंतरिक छटपटाहट के तहत अपने को व्यक्त कर पाने,जिंदगी की किसी सच्चाई को उद्घाटित कर पाने का प्रयास करता है। इसी से उसे आंतरिक संतोष की प्राप्ति होती है।
भीष्म साहनी का साहित्य में योगदान
कहानियांः झरोखे, कड़ियाँ, तमस, बसन्ती, मैयादास की माड़ी और कुन्तो भीष्म साहनी के उपन्यास हैंकहानी संग्रह : भाग्य-रेखा, पहला पाठ, भटकती राख, पटरियाँ, वाङचू, शोभायात्रा, निशाचर, पाली
उपन्यास : झरोखे, कड़ियाँ, तमस, बसंती, मय्यादास की माड़ी, कुंतो, नीलू नीलिमा नीलोफर
नाटक : कबिरा खड़ा बजार में, हानूश, माधवी, मुआवजे
आत्मकथा : आज के अतीत
बाल-साहित्य : गुलेल का खेल, वापसी
अनुवाद : टालस्टॉय के उपन्यास ‘रिसरेक्शन’ सहित लगभग दो दर्जन रूसी पुस्तकों का सीधे रूसी से हिंदी में अनुवाद
सम्मानः 1975 में तमस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, शिरोमणि लेखक अवार्ड (पंजाब सरकार) मिला।
 १९८० में एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन का लोटस अवार्ड, १९८३ में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड ।हिंदी अकादमी, शलाका सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 1998 में भारत सरकार के पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित किया गया।
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