“चांदखोल पर थाप’ यानि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी! 

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रामदेव सिंह ने लिखी पुस्तक समीक्षा
रामदेव सिंह ने लिखी पुस्तक समीक्षा
  • रामदेव सिंह

“चांदखोल पर थाप’ कवि और निबंधकार राजमणि मिश्र की यह किताब लगभग एक वर्ष से मेरे सफरी बैग में सफर करती रही है। कभी पटना से गाँव तो कभी गाँव से पटना- बनारस फिर वापस गाँव। पढ़ने के क्रम में कोई न कोई दूसरी व्यस्तता हो जाती और अन्त तक नहीं पहुंच पाता। लिहाजा अगली बार फिर से शुरू करता। लेकिन पुनः पुनः पढ़ने में एक लाभ यह होता कि हर निबंध के कुछ और आयाम खुल जाते।

साहित्य की विधाओं में निबंध लिखना मुझे सबसे कठिन लगता रहा है। निबंध लिखने का मतलब है खूब अध्ययन के साथ कल्पना और अनुभूति को पकड़ना आता हो। और पाठक के रूप में दुबारा नहीं पढ़े तो बहुत कुछ छूट जायेगा।

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राजमणि मिश्र की इस किताब का शीर्षक इतना आकर्षक है कि एक पाठक के रुप में इसे पढ़ने की ललक और जिज्ञासा का होना स्वाभाविक था। लेखक के एक फुट नोट से पता चला कि चांदखोल एक तरह का वाद्य यंत्र है, जिसका उपयोग बंगाल की कीर्तन मंडली एवं इस्कॉन मंदिर में किया जाता है। पलटकर किताब का आवरण देखा तो स्पष्ट हो गया और इसकी गूंज सचमुच कानों तक पहुंचने लगी।

यह अनुगूँज है भारतीय वांग्मय में समाहित शाश्वत जीवन-दर्शन से लेकर आधुनिक जीवनशैली तक। जीवन की छोटी से छोटी और सामान्य घटनाओं पर भी उनकी नजर नये चिंतन को जन्म देती है। ‘चांदखोल’ पर पड़ने वाली थाप से निकलने वाली अनुगूँज पाठकों तक भी पहुंचती है, जिसके साथ पाठक अपना तादात्म्य महसूस किये बिना नहीं रह सकता है।

इस किताब में लेखक का अपने अध्ययन और जीवन व्यवहार से बना दृष्टिकोण पाठकों से इस तरह मिलता है कि लगता है लेखक उन्हीं के बीच बैठकर बोल बतिया रहा हो। आधुनिक जीवन की आपाधापी में महत्वाकांक्षा की मृगतृष्णा में पड़कर कौन नहीं बेचैन रहता है? हर आदमी गतिमान है। किसी के पास ठहर कर सोचने की फुर्सत नहीं है

राजमणि जी के पास पौराणिक संस्कृत ग्रन्थों से लेकर आधुनिक प्रतिनिधि साहित्य का अध्ययन है। उन्हें मिर्जा ग़ालिब की शायरी से लेकर नीरज के गीत और कुंवर नारायण  से लेकर आलोक धन्वा की कविताएँ अपनी बात कहने का जरिया बनती हैं। उनके निबन्धों में बुद्ध, चार्वाक, शंकर, रामानंद, बल्लभाचार्य, सूर, तुलसी, कबीर, रैदास, मीरा के साथ कार्ल मार्क्स, सुकरात, प्लेटो और जरथुस्त्र तक का जिक्र अनेक संदर्भों में आता है। सबसे बड़ी बात है, इन्हें सही जगह पर संदर्भित करना। वे अपने निबन्धों में उन श्लोकों, गीतों के मुखड़ों  का इस्तेमाल तो करते ही हैं, जो जनमानस में भ्रमण करता रहता है, मानीखेज फिल्मी मुखड़े तक का इस्तेमाल करते हैं।

मुझे तो एक निबंध पढ़ते हुए सुखद आश्चर्य हुआ, जब उन्होंने कॉमरेड शिवदास घोष के किसी विचार का जिक्र किया। यानी लेखक को किसी खास विचारधारा से कोई परहेज नहीं है, बल्कि जो भी जहाँ अच्छा है, उसे चुन लेना उनकी प्राथमिकता है।

इस किताब को पढ़ते हुए मैंने लेखक के अध्ययन और अनुभव से नि:सृत विचारों को अण्डरलाइन भी किया है, जिनमें कुछ को ही यहाँ उधृत कर रहा हूँ, ताकि इस पुस्तक के मिज़ाज को आप थोड़ा समझ सकें

” निरमल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा”- रामचरितमानस।

” मन जितना निर्मल होगा,  जीवन उतना ही सरल होगा। निरमल मन परमार्थ कार्यों की ओर उन्मुख होता है तथा यही मन समाज में व्याप्त विसंगतियों व कुरीतियों को उखाड़ फेंकने का हौसला रखता है। मन की मलिनता मिटा उसे पवित्र बनाये बिना न तो प्रेम में स्थिरता होती है और न भक्ति में गहनता….” ( मान जा मेरे मन पृष्ठ संख्या- 32 )

धीरे-धीरे संयुक्त परिवार की अवधारणा समाप्त हो रही है और व्यक्तिगत परिवार अस्तित्व में आ रहे हैं। अपने आप में सिमटते जा रहे व्यक्तिगत परिवार में माता-पिता के लिए हृदय और मन में भी स्थान कम हो रहा है। फलस्वरूप बुजुर्गों को अकेले रहना पड़ रहा है। यदि वे बच्चों के संग भी रहते हैं, तो घर की मुख्य धारा का अंग नहीं माना जाता। वे घर में रहकर भी अकेले हो जाते हैं। उनकी शिकायत रहती है, उनको कोई तवज्जो नहीं देता।”- (भारतीय संस्कृति और बुजुर्ग, पृष्ठ संख्या 85 )

इसी तरह ‘मौन’ पर छोटा सा निबंध है। यह हमारे समय की विडम्बना है कि हम बहुत ही वाचाल समय में जी रहे हैं। वे जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों से अपनी बात शुरू करते हैं-

“जिस निर्जन में सागर लहरी, अम्बर के कानों में गहरी, निश्छल प्रेम कथा कहती है, तज कोलाहल की अवनि रे”

“हमारे अन्तर्जगत के क्षिति, जल, पावक  गगन और समीर के बीच निरन्तर मौन संवाद चलता है। ठीक वैसे ही प्रसाद जी के भाव संसार में अवनि के कोलाहल से दूर सागर और अंबर के बीच अनवरत-अविराम बातें जारी हैं। बातचीत का विषय है- प्रेमकथा।”

इस संग्रह में 49 निबंध हैं। और लगभग सभी निबन्धों के सरोकार सामाजिक और हमारे मनोभावों से जुड़े हैं, जिसे हम सभी कभी न कभी महसूस करते रहते हैं। राजमणि जी ने अपने अर्जित ज्ञान और अनुभव से उसे अभिव्यक्त किया है, जिसमें दर्शन के साथ व्यंग्य का पुट भी है  जो इन निबन्धों को रोचक और पठनीय बनाता है।

इस किताब के ब्लर्ब पर सुविख्यात विद्वान रंजन सूरिदेव के इस कथन से हर पाठक सहमत होगा कि “इन निबन्धों में लेखक की स्वच्छन्दता, सरलता, आडम्बरहीनता, घनिष्ठता एवं आत्मीयता के साथ उसके वैयक्तिक आत्मनिष्ठ दृष्टिकोण का भी उल्लेख हुआ है।”

राजमणि मिश्र के निबंधकार से यह मेरा पहला परिचय था। अबतक मैं उन्हें एक कवि के रुप में ही जान रहा था। उनके एक काव्य संग्रह की कभी समीक्षा भी की थी। लम्बे समय तक हमलोग मुगलसराय रेल मंडल में साथ थे। इन दिनों वे दानापुर रेल मंडल में राजभाषा अधिकारी हैं। रेल की पत्रिका ‘ रेलवाणी’ के सम्पादक हैं। इस किताब को पढ़ते हुए जो मुझे सबसे ज्यादा खुशी हुई, वह यह कि अपने रचना कर्म के साथ-साथ उन्होंने अपने पाठक को अध्ययन से समृद्ध किया है। ललित निबंध लेखन में इसकी जरूरत भी है।

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