घोड़ा, गाड़ी, नोना पानी औ नारी का धक्का, इनसे बच के रहो मुसाफिर

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घोड़ा, गाड़ी, नोना पानी औ नारी का धक्का, इन चारों से बचो मुसाफिर फिर मौज करो कलकत्ता! बचपन में यह सुना था, तब समझ न पाया। बड़े होने पर इसका मायने समझा।
घोड़ा, गाड़ी, नोना पानी औ नारी का धक्का, इन चारों से बचो मुसाफिर फिर मौज करो कलकत्ता! बचपन में यह सुना था, तब समझ न पाया। बड़े होने पर इसका मायने समझा।

घोड़ा, गाड़ी, नोना पानी औ नारी का धक्का, इन चारों से बचो मुसाफिर फिर मौज करो कलकत्ता! बचपन में यह सुना था, तब समझ न पाया। बड़े होने पर इसका मायने समझा। तकरीबन पांच दशक पहले कलकत्ता के अपने छिटपुट प्रवास के बारे में बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार भीम सिंह भवेश

भिखारी ठाकुर का ‘विदेशिया’ नाटक के जीवंत पात्रों का कलकत्ता में परम्परागत रूप से रचने-बसने का अंतिम दशक था। तब बिहार और उत्तर प्रदेश के कलकत्ता में रहने वाले ज्यादातर लोग वहाँ के कल-कारखानों में दरवानी, पुलिस में सिपाहीगिरि, खटाली और छोटे-मोटे व्यवसाय करते थे। गाँवो के अनुभवी लोग उपरोक्त कहावत से अपनों को अगाह करते थे। वे घर की माली हालत भूलकर कलकत्ता में लूटाने, लूगाई रखने और बर्बादी के बाद गाॅव वापसी के देखी-अनदेखी घटनाओं से मर्माहत थे। बुजुर्ग कलकत्ता जाने वालों को चेतातेे थे “बबुआ! घोड़ा, गाड़ी, नोना….. । यानी कलकत्ता का घोड़ा रेस (सट्टा), गाड़ी (तब देश में सर्वाधिक वाहनें थीं) शराब और नारी (बंगालीन का मोहजाल) इन चारों से जो बच गया, कलकत्ता में मौज करेगा।”

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इसी दौर के उतरार्द्ध 1976 में कलकत्ता जाने का अवसर मिला था। सेना में कार्यरत पिता जी द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1946 से ही कलकत्ता के खिदिरपुर एरिया स्थित ब्रेथवेट कम्पनी में नौकरी कर रहे थे। कुछ दिनों बाद गांव के बैजनाथ सिंह, बालेश्वर सिंह, लोकनाथ सिंह आदि की नौकरी लगवाए। धीरे-धीरे कंपनी में ग्रामीणों की संख्या दस पहुँच गयी।

मैं पहली बार ट्रेन पर चढ़ा था। हावड़ा स्टेशन पर उतरने के बाद लोगों की भीड़, गड़ियों की रेलम-पेल, बड़ी-बड़ी बिल्डिंगे, दो-तल्ला बसें, टन, टन, टन…. घंटी बजाती ट्रामें और विशालकाय पानी की जहाजें देख आंखें फटी रह गयी थीं। लगा था दूसरी दुनिया में पहुँच गया। पिता जी के पास पहुंचते ही उन्होंने एक आदमी से मीठा पानी लाने को कहा। तब गांवों में किसी आगन्तुक के आगमन पर मीठा पानी (शर्बत) और गूड़ दिए जाने की बातें याद आयीं। लेकिन पानी पीया तो सामान्य लगा। मैंने पिता जी से कहा कि “यह तो गांव वाला ही पानी है।” उन्होंने बताया कि यहां मीठा और खारा पानी अलग-अलग होते हैं। एक ही धरती से दो तरह का पानी! बात दिमाग में नहीं घुसी थी।

थोड़ी देर बाद नहाने के लिए मुझे नल पर ले गए। आरा शहर में दशहरा घुमने के समय ऐसा नल देखा था। उस वक्त गाॅव में नियमित स्नान का आदी नहीं था। बड़ा मजा आया लेकिन नहाते वक्त मुॅह में नमकीन पानी आ गया। नहाकर लौटा तो काठ का चप्पल आ गया था। तब हवाई चप्पल सामान्य प्रचलन में नहीं था। यह लोअर ओर मिडिल क्लास तक नहीं पहुँचा था। पहली बार काठ का चप्पल पहनने का अजीब अनुभव था। लेकिन लोहे की कंपनी के एक छोर पर क्वाटर होने के कारण पैरों में कील गड़ने का खतरा से अवगत करा दिया गया था।

नास्ते की शुरूआत चाय के साथ पावरोटी से हुई। पावरोटी, केक, कुल्हड़ की सोंधी चाय और मीठी दही, झाल-मुरी, सिंगापुरी केला, डाभ, आमलेट, तड़का आदि का स्वाद पहली बार चखा।

प्रति घंटा, घंटे की संख्या में घंटी बजाने वाली  दीवाल-घड़ी, बडे़-बड़े क्रेन, वाल-क्रेन, व्हील गेट, कंपनियों के सायरन, बडा जेनरेटर, सिरिज-लाइट, वेपर-लाईट, लैम्प-पोस्ट एवं ओडिया, नेपाली तथा बंग्ला भाषा से रुबरु होने के साथ टेलीफोन पर बतियाने का अजीब अनुभव रहा। ब्रेथवेट कम्पनी की स्थापना कलकत्ता में 1930 में हुई थी। इसमें  1934 से भारतीय रेल के लिए वैगन बनना शुरू हो गया था। कम्पनी में तीन शिफ्ट में काम चलता था। कारखाने के वर्कर अपनी हाजिरी निर्धारित कार्ड को मशीन में पंच करके बनाते थे। आफिस के गेट पर लकड़ी के तख्ते में पोस्टकार्ड साइज के कार्ड क्रमवार रखे रहते थे। वर्कर अपना कार्ड पहचान कर मशीन में डाल देते, जिसमें डेट और टाईमिंग पंच हो जाता। अनपढ़ मजदूर अपने कार्ड में कोई सिम्मबल (लकीर, शून्य, चांद, नाव अथवा तीर का आकार) बना देते थे, ताकि अपना कार्ड पहचान जा सकें। तब की वह अद्यतन तकनीक थी।

पिता जी के साथ करीब चार माह रहने के कारण सुबह जगने, रोज स्नान करने और रोटी खाने की जो आदत लगी, वह दिनचर्या ही बन गयी। अधिक उम्र के लोगों के साथ रहने के बावजूद कभी परेशानी नहीं हुई, क्योंकि सभी ग्रामीण बहुत मानते थे। वे बोलते थे “बबुआ, तोरा बाबूजी के कारण हमनी के विराट कम्पनी में नोकरी मिलल।”

पिता जी द्वारा गांव के उन परिवारों से स्थापित संबंध आज तीसरी पीढ़ी में भी गोतिया-भवधी से आगे, खूनी-रिश्ता के बतौर बरकरार है। दुःख-सुख में ये सभी परिवार एक साथ दिखते हैं। उस समय मेरे गाँव के लोग ब्रेथवेट कम्पनी, मेडिकल कॉलेज और शीप में नौकरी करते थे। इन तीनों स्थानों को ग्रामीण “विराट कंपनी, मटिया कॉलेज और जहाज में नोकरी” करना बताते थे।

दोतल्ला बस के ऊपरी तल पर बैठने और खिदिरपुर डक पुल को खड़ा होते देखने का मजा ही कुछ और था। अस्ट्रिया द्वारा 1966 में निर्मित यह पुल जहाजों के आवागमन के वक्त दोनों ओर खिसकर खड़ा होने पर दैत्याकार रूप अख्तियार कर लेता था।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1972 में हुगली नदी पर दूसरा पुल और मेट्रो रेल की आधारशिला रखे जाने के बावजूद निर्माणकार्य में खास तेजी नहीं थी। काली मंदिर, धर्मतल्ला मैदान, विक्टोरिया, चिड़ियाघर या दक्षिणेश्वर में घुमते वक्त ज्यादातर लोग हिन्दी भाषी ही मिलते। तब बंगालियों की यह उक्ति अजीब लगती “दादा, तुमी हिन्दुस्तानी आचे?” इच्छा होती कि हम भी पूछे “दादा, तुमी पाकिस्तानी आचेन?” क्षेत्र के विधायक राम प्यारे यादव और मुख्यमंत्री ज्योति बसु थे।

मुख्य सड़क से भीतरी मुहल्ले तक मानव-चालित हाथ-रिक्शे खूब दौड़ते थे। दशहरे में सड़कों पर उमड़े जन सैलाब और स्प्रिंग चालित प्रतिमाएं पहली बार देखा था। ट्राम का भाड़ा दस पैसे से एक रुपये और बस का पच्चीस पैसे से दो रुपये तक था। हावड़ा से हाइडरोड़ (11 कि.मी.) जाने के लिए 12सी बस थी, जिसका किराया पचहत्तर पैसे (अब 10 रूपए) थे। वहां नौकरी-पेशा वाले करीब 60 से 70 प्रतिशत बीमा (डाक  द्वारा लिफाफे में रुपए भेजना), 20 से 30 प्रतिशत मनीआर्डर और 10 प्रतिशत लोग घर जाने वाले परिचितों के हाथों अपने घर रूपए भिजवाते थे। रुपए के साथ कलकतिया गमछा, ढेलवा साबुन, हिमताज तेल, चायपत्ती, कलकतिया ओल (सब्जी बनाने पर मुँह नहीं काटता), गरम गंजी (इनर) और कपड़ा आदि भेजने की परंपरा थी। कुछ लोग दूसरे का सामान नहीं ले जाने की चालाकी में छुट्टी लेकर अचानक घर निकल जाते थे। लौटने पर कुछ बहाना बना देते। अधिकांश लोग बिना रिजर्वेशन के ट्रेन से आते-जाते थे।

तब मैं आरा प्रखंड़ के मध्य विद्यालय जमीरा का सातवीं वर्ग का छात्र था। बिहार में अंग्रेजी की पढ़ाई छठे वर्ग से शुरू होती थी। पिता जी दस रुपए माहवारी पर वहां ट्यूशन लगा दिए। मैं केवल ए से जेड़ तक कैपिटल लेटर में लिखना जानता था। दिनभर खाना, पीना, सोना और थोड़ा पढ़ना। शाम में ट्यूशन और भोजन के बाद पिता जी का पैर दबाते हुए वन टू फिफ्टी, हण्ड्रेड, थाउजेंड की गिनती और कभी-कभी सेना, कलकत्ता और विदेश की बातें सुनना, यही दिनचर्या थी। पहली बार मेट्रो सिनेमा हाल में 1973 में बनी फिल्म बाबी देखी थी। हॉल के फर्श पर तोशक जैसा गद्दा बिछा हुआ था।

1981 में पिता जी की अवकाश प्राप्ति पर पुनः कलकत्ता गया। उन दिनों हुगली नदी पर दूसरा लाॅगेस्ट केबल ब्रिज और हावड़ा स्टेशन पर अण्डरग्राउंड पाथ-वे काफी चर्चा में था। इस बार का एक वाक्या याद है। गोपालगंज के सुदीश, जिन्हें मामा कहता था। वे खाना बनाते हुए हिन्दी, अंग्रेजी और मैथ सब पढ़ा देते थे। पहाड़ा याद कराने की विधि अलग थी। पन्द्रह का पहाड़ा याद कराते थे- पंद्रह दूना तीस, तिया पैतालिस, चौके साठ, पचे पचहतर, छक्का नब्बे, सात पचोत्तर, आठे बीसा, नौ पैंतीसा, झका-झुमरिया डेढ़ सौ।

उनके दोस्त आलोक वर्मन मिल गए। ये अपने को अँग्रेजी का डिक्शनरी बताते थे। राम-सलाम के बाद पूछ बैठे।  “लेखा-पोढ़ा कोरचेन?” मैंने कहा “जी।” “कोतो क्लासे पोडेन?” “इन्टर में।” “एसैसिनेशन का स्पेलिंग की हबे?” मैंने रोमन पद्धति से स्पेलिंग बताना शुरू किया। “एएसइएसआई…।” अभी बोल ही रहा था कि चिल्लाए। “थामुन, थामुन, थामुन बाबा। एही भावे मोने थाकबे ना।” मैं शर्मिन्दित हुआ। वे बताने लगे। “गधा ऊपर गधा, ताके ऊपर आमी (मैं), आमी ऊपर नेशन। इजक्वलटू  ऐसोसिनेशन”। मैं दंग रह गया। Assassination (हत्या) का स्पेलिंग याद कराने का क्या फार्मूला है!

छः साल बाद 1987 में दक्षिण भारत के कालेज टूर पर भाया कलकत्ता गया। पिता जी के रिटायरमेंट के बाद गाँव लोका चाचा के क्वार्टर में समान रखकर सब लोग घूमने निकल गए। माँ काली का दर्शन के साथ 1984 से प्रारम्भ मेट्रो पर हम लोग चढ़े। मेट्रो की अंतिम सीढ़ी “एक्सलरेटर” से एक सहपाठी दुबे जी अचानक छाता देखकर भड़के सांड की तरह उछल गए थे। सभी लोग हस दिए थे लेकिन बिना झेंपे बड़ी चतुराई से जवाब दिए “बबुआ, हसल ठीक, फसल ठीक ना।” फिर कई मित्रों ने उनकी तारीफ की- “दुबे जी चिक फांदते  होंगे, रात को छेरदवाली फांदते होंगे…..”  वे बेअसर हँसते-बोलते यात्रा का आनंद लेते रहे।

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तब महंगाई कोई खास नहीं बढ़ी थी। हम 13 लोग करीब 94 रूपए में एक सामान्य होटल में खाना खाए। इस बार एक नया कलकत्ता, जिसमें शहर का विस्तार, वामपंथी प्रशासन का प्रभाव एवं हवाई-अड्डा के साथ आधुनिक जीवन-शैली के पुट दिखने लगे थे। सरकार की विकास के प्रति रुख अच्छा नहीं होने की चर्चा हो रही थी। पार्टीगत गुंडागर्दी बढ़ने लगी थी। पुराने कल-कारखानों की दीवारें उदास होने लगीं थीं। मशीनें जंग खानी शुरू हो गयी थीं। उन इलाकों के क्वार्टरर्स खंडहर में तब्दील होने लगे थे, जहाँ कभी चैबीस घंटे गुलजार रहता था। कामगार और उनके परिजन वापस जाने लगे थे। नए कारखाने खुलने लगभग बंद हो गए थे। शहरी चकाचैंध का रुख नए इलाके की ओर हो चुका था।

24 जुलाई 1994 का दिन कभी नहीं भूल सकता। छोटे भाई अरविंद को मरीन सेवा में बहाली के पूर्व मेडिकल के लिए कलकत्ता ले गया था।  ब्रेथवेट कंपनी की नौकरी में गांव के राम लायक भैया और राम नेवास भईया रह गए थे। दही घाट के हेस्टिंग मेरिन डिपार्टमेंट में मेडिकल था। मैं नेवास भईया के पास बैठा था। वहीं एक आदमी आकर नेवास भईया से अलग हटकर कुछ बतियाया। वे अचानक उदास हो गए। उनकी आंखें डबडबा गईं। उन्होंने गमछा से आंखें पोछीं। कुछ क्षण रुककर बोले “रामानन्द चा ना रहलन।” और फफक पड़े। मैं भी अधीर हो उठा।

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बाद में पता चला कि अनुज भरत डीएम के स्टेनो श्याम सुंदर दुबे जी से बोलकर उनके एक परिचित के माध्यम से पिता जी की मृत्यु की असह्य सूचना दूरभाष से दिलवाई थी। तत्काल सूचना का कोई अन्य माध्यम नहीं था। अरविन्द को यह सूचना नहीं दी गई। उन्हें विशाखापत्तनम भेजकर मैं घर लौट गया। क्या विडम्बना रही! पिता जी की मृत्यु के वक्त उनके साथ होने की वजाय उनकी कम्पनी में था।

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2011 में ए ट्रिपल ई की परीक्षा दिलाने बेटे-बेटी को लेकर उसी रूट में बेहला गया था। तीसरी पीढ़ी को भी ब्रेथवेट कंपनी घुमाया। इस बार वहां सभी लोग अपरिचित थे। पिता जी का परिचय दिया और बच्चों को कम्पनी दिखाने का मकसद बताया तो मो. इद्रिस नामक जमादार बहुत प्रसन्न हुए। संयोग से वे पिता जी वाले कमरे में ही रहते थे। अपने कमरे में बिठाए, घुमाए, चाय पिलाए और बोले कि “ओस्ताद का बहुत नाम सुने हैं। बहुत लोगों को नौकरी लगाए थे। पढ़े-लिखे थे।” मैं उन्हें नहीं बता पाया कि पिता जी जिला स्कूल आरा से मात्र सातवीं पास थे।

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12 सितम्बर को पुरी भ्रमण के क्रम में पुनः सपरिवार वहां जाने का अवसर मिला। स्टीमर से हुगली नदी पार करने के दरम्यान पांचवी कक्षा में पढ़ रही भतीजी सुनीती ने एक डायरी दी। इसमें आरा से हावड़ा पहुंचने का बाल सुलभ रोचक वर्णन अग्रेजी में था। स्मृतियों में 1976 का कलकत्ता लौट आया। तब सुनीती से अधिक उम्र के बावजूद ए,बी,सी,डी….सीख रहा था। लगा कि अब “कलकता” नहीं “कोलकाता” में हूॅ। बगल में हावड़ा ब्रिज यथावत खड़ा था!

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