‘गीत कभी गाता हूँ मैं, गीत कभी गाता मुझको’ के बहाने वीरेंद्र की याद

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'गीत कभी गाता हूँ मैं, गीत कभी गाता मुझको' के बहाने गीतकार वीरेंद्र जी को याद किया है वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार हरीश पाठक ने।
'गीत कभी गाता हूँ मैं, गीत कभी गाता मुझको' के बहाने गीतकार वीरेंद्र जी को याद किया है वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार हरीश पाठक ने।

‘गीत कभी गाता हूँ मैं, गीत कभी गाता मुझको’ के बहाने गीतकार वीरेंद्र जी को याद किया है वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार हरीश पाठक ने। इसी बहाने कई पत्रकार मित्रों का जिक्र भी उन्होंने किया है।

  • हरीश पाठक

धीरे-धीरे शाम उतर रही थी। आलोक तोमर और गीतम मिश्र जा चुके थे। वे अक्टूबर के दिन थे। मौसम में ठंडी हवाएं बह रही थीं। जब तक आलोक साथ रहा, वह मामा जी (आभा के मामा होने के कारण वह भी वीरेंद्र जी को मामा जी कहता था) के ही बारे में बतियाता रहा।

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वह इसलिए भी खुश था कि जनसत्ता का वह सफलतम रिपोर्टर साबित हो रहा था। क्राइम उसकी बीट थी। उसकी रोज बाइलाइन छपती। प्रभाष जोशी उस पर, उसकी भाषा पर मुदित थे। बाबा खड़गसिंह मार्ग पर बंगलासाहिब गुरुद्वारे के सामने बने सरकारी क्वार्टरों में भिंड के संचार मंत्रालय में काम कर रहे एक सज्जन के नाम उसने सौजन्य अर्जुन सिंह (वे केंद्र में संचार मंत्री थे) एक क्वार्टर अलॉट करवा लिया था। वे सज्जन कहीं और रहते थे। मैं इसलिये खुश था कि देर से ही सही, आलोक का घर हो गया। वह ढाई साल बाद मेरे घर से शिफ्ट हो गया और उसने उस बड़े से घर को बहुत व्यवस्थित ढंग से सजा लिया था।

वीरेंद्र जी मेरे बेहद प्रिय कवि थे, यह मेरे दोस्तों को अच्छी तरह मालूम था। यह भी कि उनके कई गीत मैं  ढंग से गुनगुना लेता था। यह भी कि तब के मेरे भाषणों की शुरुआत या तो  मुकुटबिहारी सरोज की कविता से होती या वीरेंद्र जी के गीत से।

‘अपनी टक्कर अपने से है, या फिर शाहजहां से है।’

यह मेरी सिग्नेचर ट्यून की तरह थी। यह वीरेंद्र जी की ही पक्तियां हैं। मैं उनसे अब तक मिला नहीं था, पर इतना रचनात्मक स्तर पर घुल-मिल गया था कि मुलाकात के बहुत मायने नहीं थे। पता नहीं क्या हुआ कि आलोक, गीतम को छोड़ने के बाद मुझे बहुत शिद्दत से वीरेंद्र जी याद आये और दफ्तर के सामने नीचे उतरकर सरदार का एक ढाबा था, जहां मैं दिन में खाना खा कर पैसा उसकी कॉपी में लिख देता। 22 तारीख को वेतन मिलता तो सबसे पहले उसी का भुगतान करता। मैं ढाबे पर पहुँच गया, खाना खा चुका था। सिर्फ एकान्त की चाह में वहां गया था। वह खाली जगह थी। कुछ इमारतें बन रही थीं। अब में मनपूर्वक अपनी ही आवाज सुन रहा था:

‘गीत कभी गाता हूँ मैं,

गीत कभी गाता मुझको।

कुछ भीतर,कुछ बाहर

जो मीत नहीं भाता मुझको

सबके अपने-अपने गम

हैं अभाव, आंसू, बादल

मैं ही नहीं शहर में हूँ,

एक शहर मुझ में भी है।

इसी गीत की पंक्तियाँ हैं:

मैं ही नहीं सफर में हूँ,

मुझ मेँ एक सफर भी है।

वीरेंद्र जी के गीतों में यह मेरा सर्वाधिक प्रिय गीत है। पूरा गीत गुनगुनाने के बाद लगा कि मैं कुछ हलका हो गया हूँ। मेरे मन और तब की मनःस्थिति को यह गीत बहुत राहत देता था। यह गीत खासकर ‘एक शहर मुझ में भी है’ जैसी पंक्तियाँ मुझे ग्वालियर पहुँचा देती थीं।

वीरेंद्र जी आ गए थे। आलोक के घर पर ही रुके थे। गीतम जी भी। मैं बीस दिन की छुट्टी ले कर विवाह के लिए ग्वालियर चला गया। आ कर मुझे दिल्ली और दिल्ली प्रेस छोड़ना था। आठ साल की नौकरी थी। मुम्बई बसना था। विवाह के बाद पत्नी को भी दिल्ली लाना था, फिर जरूरी सामान ले कर, पत्नी को ग्वालियर छोड़ मुम्बई। मुम्बई में मेरा न कोई परिचित था, न मुम्बई के जीवन का मुझे कोई अनुभव था। यह भी कि दिल्ली प्रेस में सीनियर था, मुक्ता का प्रभारी। वहां धर्मयुग में जूनियर मोस्ट। बड़ा संस्थान था टाइम्स ऑफ इंडिया। पक्की नौकरी। पैसे भी ज्यादा, लिहाजा रिस्क ले रहा था।

विवाह के लिए निकल ही रहा था कि नौरोजी नगर के उस सरकारी क्वार्टर की मकान मालिक ने जिन्हें मैं माताजी कहता, साफ-साफ कहा, ‘शादी मुबारक हो, पर घर छोड़ कर जाओ’। मैं अवाक। क्या हुआ? छह साल से आपके साथ हूँ, घर आपका बदलता रहा, पर मैं तो नहीं बदला और कल तो आप बहू आने की खुशी मना रही थी। अचानक यह क्या? पर वे टस से मस नहीं हुई। खुले दरवाजे पर हो रही यह बात सामने के फ्लैट की आंटी ने सुन ली। उनकी छोटी बेटी को मैने दिल्ली प्रेस में लगवाया था।

उन्होंने मुझे बुलाया। चाय पिलायी। मेरा उतरा हुआ चेहरा देखकर कहा, ‘आज अभी तू अपना सामान मेरे खाली पड़े एक कमरे में रख दे। बहू को ले कर यहीं आना। खुशी-खुशी जा। मैंने तत्काल सामान उठाया। नए कमरे को व्यवस्थित किया। सबको मालूम था कि शादी के बाद मुझे मुम्बई जाना है। निजामुद्दीन से मुझे कुतुब एक्सप्रेस पकड़नी थी। आंटी ने कलश भर कर मुझे विदा किया। विवाह के बाद पत्नी सहित आंटी के ही घर आया। मेरे पहुँचने के कुछ ही देर बाद सामनेवाली माताजी आ गयीं। हम दोनों को भोजन पर आमन्त्रित करने। मुझ सहित आंटी भी हैरान थी कि यह कैसी औरत है? प्यार भी, उपेक्षा भी। पहले घर से निकाला, अब भोजन पर बुला रही है। पर मैं गया, क्योंकि वे दिल्ली में मेरे गिने चुने दिन थे।

मुम्बई से गणेश मंत्री जी का फोन आ गया। फोन आलोक के ही घर पर आता था। दफ्तर में निजी फोन और चिठ्ठियां प्रतिबंधित थीं। मंत्री जी ने कहा, ‘भारती जी (डॉ धर्मवीर भारती) जानना चाहते हैं कि आप किस तारीख तक आ सकेंगे? ‘मैंने मंत्री जी से एक दिन का वक्त मांगा। उस दिन दफ्तर से छुट्टी ली और सबसे पहले पत्नी सहित वीरेंद्र जी से मिलने आलोक के घर गया। उन दिनों आलोक की माँ आयी थी। मैं उन्हें मम्मी कहता था। शादी के सूट में मुझे देखकर सबसे ज्यादा खुश वीरेंद्र जी हुए। दोपहर से कब रात हो गयी, पता ही नहीं चला।

मैं स्तब्ध था कि हिंदी का यह शिखर गीतकार, जिसके गीतों को पढ़ कर, सुन कर हम बड़े हुए। वह पहली ही मुलाकात में इतना आत्मीय, विनम्र और अपनेपन से भरा मिलेगा। मेरे लिए यह कल्पनातीत था। वह मेरे लिए घर के उस बुजुर्ग की तरह थे, जो मुम्बई में बसने, सफल होने की  जरूरी जानकारी दे रहे थे। वे वीरेंद्र जी ही थे, जिनसे मैंने जब कहा- मेरे बड़े भाई के मित्र ने मालाड के अपने घर की चाबी भी दे दी है, तब उन्होंने छूटते ही कहा, ‘बहुत खूब, पर यह चाबी मुम्बई की तरह चमकदार साबित न हो जाये, इसलिए विकल्प भी साथ रखना। वहां सबसे बड़ा दुख घर का ही है। फिर बहू का छतरपुर से मुम्बई रेडियो में ट्रांसफर हो ही जायेगा। वहां नेपियन सी रोड पर बहुत अच्छे सरकारी घर हैं, मिल ही जायेंगे। उन्होंने देर तक उस चाबी को देखा और कहा, भाग्यवान हो। ईश्वर करे सब शुभ हो।’

पर वीरेंद्र जी अक्षर अक्षर सही थे। चाबी चमकदार ही साबित हुई। बड़े भाई ने तो चाबी दे दी थी, पर छोटे भाई ने सफाई के बहाने चाबी ले ली और दूसरे दिन सुबह ही दफ्तर फोन कर बताया, ‘गुजरात से बुआ जी आ गयी हैं। उन्हेँ कैंसर है। आप अपनी व्यवस्था कर लें। उस घर में तो अब बुआ जी ही रहेंगी।’

यहां भी वीरेंद्र जी ही काम आए। उनकी विकल्प की बात मुझे जंची थी और मैं दूसरे ही दिन रविवार के दफ्तर जा कर उदयन जी (उदयन शर्मा) से मिल आया था। उन्होंने मुझे कुर्ला की एक लॉज के मालिक के नाम चिट्टी लिखकर दी और कहा जरूरत पड़े तो यहां चले जाना। जब चाबी ने अपना असर नही दिखाया तो मैं कुर्ला गया। लॉज के मालिक ने मुझे प्रतीक्षा सूची दिखाई।  यह भी कहा, उदयन जी के मित्र हो तो कुछ करूँगा और दस दिन बाद एक कमरे में एक बेड मुझे मिल गया। बाद में पूरा कमरा। चौदह महीने तक मैं इसी लॉज में रहा।

उस दिन आलोक के घर की वह मुलाकात आज भी मेरे  सामने घूम जाती है। लगभग आठ घण्टे में वीरेंद्र जी के साथ रहा। हर मुद्दे पर उनसे बात हुई। नवगीत की राजनीति से ले कर मंच के छल- छद्मों तक। पर किसी के प्रति कोई कटु शब्द, दुख से या हताशा में डूबा कोई बाकया उनके मुंह से नहीं निकला। मंच के दुराग्रहों से दूर एक ऐसी सात्विक छवि, जो मैंने सुनी भी थी, देखी भी। नवगीत के इस प्रवर्तक ने उस मुद्दे पर भी कुछ नहीं कहा- जब इरादतन उन्हें नवगीत के उस पूरे आभा मण्डल से ही दूर कर दिया गया था। न नवगीत दशक में उनको शामिल किया, न उनका नाम नवगीत की प्राण प्रतिष्ठा में लिया गया। सारा सब कुछ शम्भूनाथ सिंह और राजेंद्र प्रसाद सिंह के हिस्से में कर दिया गया था।

आज उनका विपुल साहित्य हमारी पूंजी है। गीतम, लेखनी बेला, अभिराम चल मधुवंती, झुलसा है छाया नट धूप में, धरती गीताम्बरा, शांति गन्धर्व, काँपती बाँसुरी, गीत पंचम, उत्सव गीतों की लाश पर जैसी कालजयी कृतियों, सांध्य मित्रा जैसी पत्रिका के अलावा लगभग एक दर्जन प्रदर्शित, अप्रदर्शित फिल्मों में उन्होंने गीत लिखे, जिन्हें शंकर जयकिशन, जयदेव, हृदयनाथ मंगेशकर और रघुनाथ सेठ जैसे दिग्गजों ने संगीत दिया। उनके गीतों को लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी  और मन्ना डे जैसे गायको ने आवाज दी।

वीरेंद्र जी से मुम्बई में भी मुलाकातें होती रहीं। अंतिम मुलाकात समन्वय संकल्प के अनिरुद्ध पांडेय के एक आयोजन में हुई। उसमें निदा फाजली भी थे। मैं दर्शक दीर्घा में पीछे कहीँ बैठा था। उन्होंने संचालक से कह कर मुझे आगे बुलाया। मंच पर बैठाया और देर तक बात करते रहे। चलते वक्त बोले, ‘क्या हम तीनों की एक तस्वीर हो सकती है। ‘वीरेंद्र जी, निदा साहब और मेरी वह तस्वीर जब भी दिखती है, खूब याद आते हैं वीरेंद्र जी। उस समारोह में जब वीरेंद्र जी ने अपना यह गीत सुनाया तो हॉल में सन्नाटा उतर आया। गीत के बोल थे:

वह अपने अश्रु में आकाश को डुबोयेगी,

नदी के  अंग कटेंगे तो नदी रोयेगी। 

नदी को हँसने दो।

नदी को बहने दो।   

1जून,1999 को हिंदी के इस अत्यंत लोकप्रिय गीतकार का निधन हो गया। मेरा दुर्भाग्य कि जब उनकी मृत्यु की खबर लिख रहा था, तब कलम कांप रही थी और आँखें टपक रही थी। कानों में न जाने कहाँ से बज रहा था:

‘उदास मन है मगर  होठ पर हसीं झूठी, खड़ी है धूप अपनी छांव से रूठी रूठी।’

(शीघ्र प्रकाश्य संस्मरणों की पुस्तक- ‘मलहरा टू मेमफिस वाया मुम्बई’ में शामिल संस्मरण)

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