कोरोना के कारण लाक डाउन में इलाज के अभाव में हो रहीं मौतें

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कोरोना के कारण लाक डाउन में इलाज के अभाव में कुछ दम तोड़ रहे तो कई दवा के और चेकअप के लिए परेशान हैं।
कोरोना के कारण लाक डाउन में इलाज के अभाव में कुछ दम तोड़ रहे तो कई दवा के और चेकअप के लिए परेशान हैं।
  • विशद कुमार

कोरोना के कारण लाक डाउन में इलाज के अभाव में कुछ दम तोड़ रहे तो कई दवा के और चेकअप के लिए परेशान हैं। यह सच है कि आज कोरोना एक वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है।  लेकिन कोरोना संक्रमण की वजह से दूसरी दूसरी बीमारियों को नजरअंदाज करना मौत को दावत देने जैसा है। लॉक डाउन की सबसे ज्यादा मार गरीबों और पहले से पीड़ित बीमार लोगों पर पड़ी है। आए दिन इसके कई उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। 9 अप्रैल को लॉक डाउन की वजह से लातेहार जिलान्तर्गत महुआडांड़ के सोहरपाठ निवासी 24 वर्षीय इन्दरजीत कंवर की असमय मौत मेडिकल सहायता समय पर न मिलके के कारण हो गई।

लाक डाउन के कारण नहीं करा सके बेटे का इलाज

अपने नौजवान बेटे इन्दरजीत की मौत के संबंध में उनके पिता रामनाथ कंवर ने बताते हैं कि जनता कर्फ्यू के दिन अर्थात 22 मार्च को एक पागल कुत्ते ने उनके बेटे सहित 3 अन्य बच्चों को भी काट खाया था। अगले दिन वे इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, महुआटांड़ गये। लेकिन अनुमण्डल स्तरीय इस अस्पताल में भी एंटी रैबिज इंजेक्शन उपलब्ध नहीं होने के कारण बेटे को इंजेक्शन नहीं दिलवा सके। इसके लिए वहां के चिकित्सकों ने कोई प्रयास भी नहीं किया, बल्कि वहां कार्यरत चिकित्सकों ने गुमला जिलान्तर्गत डुमरी अस्पताल ले जाकर इलाज कराने की सलाह दे दी। अगले दिन देशव्यापी तालाबन्दी के कारण कहीं जाना संभव नहीं था। उसके बाद से अब तक लगातार लॉक डाउन की अवधि बढ़ती रही।

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6 मई को मृतक इन्दरजीत में कुत्ते काटने के संक्रमण दिखाई देने लग गये थे। उसे किसी तरह महुआडांड़ के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया। वहां तुरन्त उसे स्लाइन चढ़ाया जाने लगा। लेकिन उसकी हालत जब और खराब होने लगी तो चिकित्सकों ने उसे सरकारी अस्पताल भेज दिया। सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों ने भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सदर अस्पताल लातेहार भेज दिया। जहां 7 मई को बेहत्तर इलाज के लिए उसे रिम्स, राँची रेफर कर दिया गया। लेकिन रिम्स में कोरोना इलाज को छोड़कर दूसरे सभी तरह के इलाज बन्द होने की वजह बताकर उसे भर्ती नहीं लिया गया। वहां किसी ने परिजनों को बताया कि पुराना थाना, रांची के पास एक अस्पताल है, जहां ऐसे लोगों का इलाज किया जाता है। वहां उसे कुछ इंजेक्शन दिये गये, लेकिन स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी थी कि वहां के चिकित्सकों ने भी जवाब दे दिया और कहा कि आप लोग इसे कोलकाता ले जाइए, वहीं उसका इलाज हो सकता है। लेकिन आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि वह उसे लेकर कोलकाता जैसे बड़े शहर में ले जाकर उसका इलाज कराते।

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चारों तरफ से निराश रामनाथ कंवर अपने बेटे को लेकर घर आ गये। जहां परिवार के लोग असहाय होकर अपने नौजवान बेटे के जीवन की भगवान से दुआ मांगते रहे और जड़ी-बूटी का इलाज कराते रहे। अंतत: शनिवार 9 मई की रात्रि साढ़े 9 बजे इन्दरजीत ने दम तोड़ दिया। उसकी मौत की खबर से पूरे गांव के लोग बहुत भयभीत हो गए हैं। इसलिए कि गांव के अन्य तीन नाबालिग बच्चों- 4 वर्षीय सुद्धी कृति, 6 वर्षीय गायत्री कुमार और 7 वर्षीया अनिता कुमारी को भी उसी पागल कुत्ते ने काटा था।

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नरेगा वाच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज बताते हैं कि सूचना के बावजूद स्वास्थ्य विभाग इस दिशा में गंभीर नहीं है। अब तक अस्पताल में ऐंटी रैबिज इंजेक्शन उपलब्ध नहीं कराया गया है। बच्चों के अभिभावक, जो थोड़े आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे निजी मेडिकल दुकान से एक इंजेक्शन के लिए 500 रूपये देकर इलाज करवा रहे हैं। उन्हें कहा गया है कि उनको नियमित रूप से 5 सूई लेनी होगी। जो गरीब हैं, वे अब भी जड़ी-बूटी के इलाज पर निर्भर हैं।

कैंसर पीड़ित का नहीं हो पा रहा रूटीन चेकअप

लोहरदगा जिला के सेन्हा प्रखण्ड के बूटी ग्राम निवासी अर्जुन भगत कैंसर से गंभीर रूप से पीड़ित हैं। उनका इलाज टाटा मेमोरियल अस्पताल मुम्बई में चल रहा है। पिछले 45 दिनों के इस कोरोना के कारण लॉक डाउन की वजह से वे नियमित चेक अप कराने भी नहीं जा पाये हैं और अब तो दवाइयां भी नहीं ले पा रहे हैं। ऐसे में उनकी स्थिति को समझा जा सकता है कि किस गंभीर संकट की ओर बढ़ रहे हैं। इसी तरह पलामू जिले के मनातू प्रखंड के विभिन्न गांवों के आदिम जनजाति परहिया समुदाय के करीब आधे दर्जन लोग टीबी की गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं। उनका भी समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है। इस लॉक डाउन की वजह से और भी कई बीमार लोगों का समुचित इलाज नहीं होने की खबरें विभिन्न समाचार माध्यमों से सामने आती रही हैं।

तिकी नामक कीड़े ने सोख लिया सांप का जहर

13 अप्रैल की रात बोकारो जिले के एक आदिवासी बस्ती जयपाल नगर में 18 वर्षीय राजू अल्डा, पिता- सुरेश अल्डा को रात में सांप ने काट लिया। कोरोना के लाक डाउन के कारण चिकित्सकों के अभाव के कारण गांव वालों ने अपनी चिकित्सा पद्धति के तहत ‘तिकी’ नामक एक कीड़ा को सांप के काटे की जगह पर चिपका दिया। उसके बाद उस कीड़े ने सांप का सारा जहर खींच लिया। पता नहीं, उस कीड़े ने जहर को खींच लिया था या सांप जहरीला नहीं था, कहना मुनासिब नहीं होगा। क्योंकि लड़के को कुछ नहीं हुआ, वह पूर्ण स्वस्थ्य हो गया। उस कीड़े के बारे में पूछे जाने पर बस्ती वालों ने बताया कि यह सिंदूर में ही रहता है और सिंदूर ही खाकर जीवित रहता है। यह कीड़ा सुसुप्ता अवस्था में सिंदूर में पड़ा रहता है, लेकिन जब सांप के काटे की जगह रखा जाता है तो यह सक्रिय होकर जहर खींचना शुरू कर देता है। जनजाति समाज के अगुआ व पत्रकार योगो पुर्ती बताते हैं कि इस चिकित्सा पद्धति को होड़ोपैथी कहते हैं।

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