कोरोना की राजनीति और राजनीति का कोरोनाकरण

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कोरोना की पहुंच पेट के बाहर तक ही नहीं रही, पैठ अंदर तक हो गई है। कोरोना साथ लिए आ रहे हैं शिशु। ऐसे में सहज सवाल- कौन है कोरोना से सुरक्षित? पढ़िए, कोरोना डायरी की इक्कीसवीं किस्त वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष मानव की कलम से।
कोरोना की पहुंच पेट के बाहर तक ही नहीं रही, पैठ अंदर तक हो गई है। कोरोना साथ लिए आ रहे हैं शिशु। ऐसे में सहज सवाल- कौन है कोरोना से सुरक्षित? पढ़िए, कोरोना डायरी की इक्कीसवीं किस्त वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष मानव की कलम से।

कोरोना बंदी के 62 दिन बाद भी न कोरोना थमा और न इस पर राजनीति। कोरोना जान लेने पर तुला है और राजनीतिकों को चाहिए सहानुभूति का सिंहासन। चाहे जिस तरह हो, गरीबों/ लोगों की सहानुभूति उनके, उनकी पार्टी के साथ ही होनी चाहिए। वे देश-काल-परिस्थिति भी नहीं देखते। इसी कारण कहना पड़ता है- राजनीतिकों के आगे सिंहासन बत्तीसी की कथा भी फेल है।

कोरोना डायरी: 20

  • डा. संतोष मानव

कोरोना बंदी के 63 दिनों में एक दिन भी खाली न गया, जब सहानुभूति बटोरने का खेल न हुआ- मैं अच्छा, वह बुरा। मैं दोस्त, वह दुश्मन। यही हुआ न?  राजनीति है क्या? राज करने की नीति या राज पाने की नीति या दोनों। राजनीति यानी येन-केन प्रकारेण सत्ता पाने या सत्ता के लिए खुद को उपयुक्त साबित करने का खेल? और यही होता रहा है कोरोना बंदी काल में। कोरोना से बचाव, संयुक्त संघर्ष की जगह गुड, बेटर बेस्ट का खेल ! आज की हेडलाइन देखिए- योगी जी कह रहे हैं कि दूसरे प्रदेशों में मजदूरों को ले जाने पर सूचना देनी होगी, दरअसल, योगी डाटा एकत्र करने, मजदूरों में कौशल विकसित करने, उन्हें यूपी में ही रोजगार देने की योजना की बात कर रहे थे। तभी दाल-भात में मूसलचंद टपक पड़े। महाराष्ट्र के राज ठाकरे।

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राज महाराष्ट्र की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुके हैं। बोले, बाहर के मजदूरों को दोबारा आने पर पुलिस को सूचना देनी होगी- सरकार पुलिस और मुझे। चलो, सरकार, पुलिस तक तो बात समझ में आती है, पर आप हैं कौन श्रीमान ठाकरे? आप कौन जी? आप नीति-नियंता हैं? आप महाराष्ट्र की राजनीति में भी न तीन न तेरह में हैं। सवाल मजदूरों का था और मजदूरों से किसी ने पूछा ही नहीं। सब सौतिया डाह में व्यस्त।  बस, हितैषी दिखाने की कवायद। योगीजी, मजदूर बुलाए कम, मर्जी से ज्यादा जाते हैं। रोटी उत्तर प्रदेश में मिल जाए, तो एक भी न जाए मुंबई। विश्वास न हो, तो मजदूरों से ही पूछ लीजिएगा।

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योगी-ठाकरे संवाद तो एक उदाहरण है। हर रोज ऐसा होता रहा। भारत देश में ऐसा रोज होता भी है। कदाचित यह राजनीति-राजनीतिकों का दैनंदिन कार्य-व्यापार हो, पर कोरोना बंदी में ऐसा हो, तो रेखांकित करना आवश्यक हो जाता है। ऐसा इसलिए कि आपातकाल में भी दैनंदिन कार्यकलाप न टूटे, तो आदमी होने का क्या मतलब? अब देखिए, राहुल गांधी दिल्ली में कुछ प्रवासी मजदूरों से मिलने गए। जाना भी चाहिए था। दुख में संवाद हौसला देता है। लगता है कि कोई पास है। सामाजिक सुरक्षा का बोध होता है।  लेकिन, देश की वित्त मंत्री ने क्या किया? मजदूरों से राहुल की मुलाकात पर संवाददाताओं ने पूछा तो निर्मला आंटी बोली, वे मजदूरों का समय खराब करने गए थे। यही है राजनीति का  कोरोनाकरण। यानी हर बात में नकारात्मकता ढूंढ़ना। संभव है राहुल वाहवाही लूटने,  सुर्खियां बटोरने मजदूरों के पास गए हों, पर यह निंदा नहीं, प्रशंसा का ही विषय था। निर्मला आंटी को चाहिए था कि वह राहुल गांधी की सराहना करतीं। कहतीं कि राहुलजी ने मजदूरों का दर्द बांटा। इससे उनका नंबर बढ़ता, घटता तो कतई नहीं।

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याद कीजिए प्रियंका-योगी पत्र युद्ध। अगर मजदूरों को ले जाने के लिए कोई बस की सेवा देना चाहता है, तो हर्ज क्या है? पर बसों की सूची में स्कूटर, कार, जीप का बहाना बनाकर अनुमति नहीं दी गई। तीन-चार दिनों तक योगी-प्रियंका संवाद टीवी, अखबारों में चलता रहा। इस पर छुटभैये भी भांजी मारते रहे। बेवजह समय, श्रम और अर्थ का अपव्यय। अगर योगी अनुमति दे ही देते, तो क्या हो जाता? पर वाहवाही कांग्रेस को क्यों? मानो वाहवाही पर बीजेपी का पेटेंट हो।

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ढिंढोरा पीटा गया कि देश के जीडीपी के दस प्रतिशत के बराबर यानी बीस लाख करोड़ का राहत पैकेज देश को दिया गया है। आपने जो योजनाएं गिनाईं, उनमें राहत कहां है? आधे में तो यह भी नहीं बताया गया है कि योजना कब शुरू होगी? गजब है जी। आप सस्ते किराए पर मजदूरों को मकान उपलब्ध कराएंगे, मकान बना रखा है क्या? बेकार की घोषणाएं! पर करना तो है न, वाहवाही का सवाल है। वाहवाही के खेत में समर्थन की फसल उगाएंगे। राजनीति का कोरोनाकरण। मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की। पर सत्तापक्ष ही क्यों, विपक्ष को देखिए, बेतुका सवाल कि प्रधानमंत्री बार-बार टीवी पर क्यों आ रहे, कोरोना काल में पांच बार आ गए। अरे भाई, दिक्कत क्या है, आने दो। अब तो एकमात्र दूरदर्शन है नहीं कि दुरुपयोग का आरोप लग सकता है। दरअसल, हर बात में दाग ढूंढना ही राजनीति का कोरोनाकरण है। यत्र-तत्र-सर्वत्र कोरोना। यूपी-राजस्थान बस भाड़ा विवाद, सोनिया गांधी की विपक्षी बैठक, सब राजनीति के कोरोनाकरण का ही उदाहरण है।

जाने भी दो यारो। हवाई जहाज आसमान में आ गए हैं। स्पेशल ट्रेन दौड़ रही है। अब संख्या भी बढ़ेगी। बाजार खुलने लगे हैं। चिमनियों से धुआं उठने लगा है। सब ठीक हो जाएगा। बस, ये कोरोना चला जाए। जाएगा ही देर-सवेर। यानी फिर से मौसम बहारों का आने को है।

(लेखक दैनिक भास्कर, हरिभूमि, राज एक्सप्रेस के संपादक रहे हैं)

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