कोरोना का खतरा- कहीं श्रम सस्ता होगा तो कहीं श्रमिक बंधक बनेंगे

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राहत पैकेज में कितनी राहत! लाक डाउन-3 के अंत समय में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5.94 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज-2 का ब्यौरा पेश किया। इसे विस्तार से समझा रहे वरिष्ठ पत्रकार श्याम किशोर चौबे
राहत पैकेज में कितनी राहत! लाक डाउन-3 के अंत समय में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5.94 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज-2 का ब्यौरा पेश किया। इसे विस्तार से समझा रहे वरिष्ठ पत्रकार श्याम किशोर चौबे

कोरोना का खतरा दिख रहा है। इससे कहीं श्रम सस्ता होगा तो कहीं श्रमिक बंधक बनने को विवश होंगे। कोरोना के कारण लाक डाउन से मजदूर खलिहर हो गये हैं। उन्हें अपने गृह राज्यों में रोजगार मिल पायेगा, इसकी गारंटी नहीं। गारंटी होती तो वे कहीं जाते ही क्यों। विस्तार से बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार श्याम किशोर चौबेः

  • श्याम किशोर चौबे

कोरोना वायरस के संक्रमण से पूरी दुनिया के जन-जीवन में मची अफरातफरी के बीच एक महत्वपूर्ण बात यह भी दिखाई पड़ रही है कि इससे कहीं श्रम सस्ता होगा तो कहीं श्रमिक बंधक जीवन जीने को विवश होंगे। खासकर भारतीय राज्यों में  आर्थिक, औद्योगिक और रोजगार के क्षेत्र में व्याप्त जबरदस्त असंतुलन के कारण श्रम और श्रमिक यह स्थिति झेलने को विवश हों तो कोई आश्यर्च नहीं। झारखंड, बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे श्रमिक उत्पादक राज्यों में कोरोना इफेक्ट के बतौर श्रम सस्ता होने, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु जैसे व्यापारिक क्लस्टर वाले राज्यों में श्रमिकों की स्थिति बंधक वाली बन जाने की आशंका है।

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झारखंड जैसे राज्यों से दशकों से श्रमिकों का स्थायी और मौसमी पलायन होता रहा है। अभी कोरोना संक्रमण काल में एक तथ्य उभर कर आया कि अपेक्षाकृत छोटे झारखंड से ही तकरीबन ग्यारह लाख कामगार अन्य प्रदेशों में रोजी-रोटी के जुगाड़ में रह रहे थे, जिनमें से अधिकतर अभी भी उधर ही हैं। कमोबेश यही हाल रोजगार के कम अवसर वाले राज्यों का भी है। पिछले डेढ़ महीने में इसी कारण औद्योगिक-व्यापारिक क्लस्टर क्षेत्रों से अपने-अपने गृह राज्यों की ओर झुंड के झुंड पांव पैदल ही निकल पड़ने वाले कामगारों की तस्वीर सामने आई। सरकार ने हालांकि हाल के दिनों में इन कामगारों की देस वापसी के लिए प्वाइंट टू प्वाइंट विशेष रेलगाड़ियां चलायीं, लेकिन उनकी विशाल संख्या के मद्देनजर वापसी की दर अपेक्षाकृत कम ही है। इसके बावजूद श्रमिक असंतुलन पैदा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

पिछले 24 मार्च से पूरा देश कोरोना की वजह से कठिन लाक डाउन के दौर से गुजर रहा है। इस बीच उद्योग, निर्माण, व्यवसाय आदि विभिन्न तरह की रोजगारपरक गतिविधियां बंद हैं। कोयले को छोड़ दिया जाये तो बाकी खान-खदानें भी बंद ही हैं। यहां तक कि घरेलू कार्यों में योगदान देनेवाले कामगार भी बेरोजगार हो गए हैं। सरकार ने भले ही फरमान जारी कर दिया है कि लाक डाउन के दौरान किसी की भी तनख्वाह रोकी नहीं जाएगी, लेकिन इस पर किस हद तक अमल हो रहा है, यह कहा नहीं जा सकता। केंद्र सरकार ने अपने कर्मियों के डीए पर डेढ़ साल की रोक लगाकर निजी क्षेत्र के हाल-बेहाल नियोक्ताओं को मनमानी करने का ब्रह्मास्त्र सौंप दिया है। इस परिस्थिति में दूर देस में रोजी-रोटी कमा रहे कामगारों की  आर्थिक स्थिति कंगाली की हद तक चली गई, जले पर नमक की तरह कोरोना के खौफ ने उनको मानसिक तौर पर निश्चय ही बहुत परेशान कर दिया है। अमेरिका, इंग्लैंड, इटली जैसे उन्नत देशों में कोरोना संक्रमितों की रोज-रोज भारी संख्या में मौत तथा देश के गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि विकसित राज्यों में भी जंगल की आग की तरह फैलते संक्रमण ने उनको विचलित कर दिया। यही कारण है कि वे भूख-प्यास और अपनी स्थिति की परवाह किये बगैर पांव-पैदल ही सैंकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर वापस होने को निकल पड़े। शुक्र है कि सरकार ने अब उनके लिए विशेष रेलगाड़ियों का प्रबंध कर दिया है, लेकिन इस हालत में भी घर आए कामगार लाक डाउन खुलते ही अपने काम पर वापस होने के लिए कितना हौसला बना पाएंगे, यह कहना आसान नहीं होगा।

देश के पिछड़े राज्यों में शुमार झारखंड जैसे राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हालांकि आर्थिक-मानसिक रूप से त्रस्त-संत्रस्त कामगारों को काफी तसल्ली दी है और उनका हौसला बढ़ाते हुए अतिरिक्त रोजगार सृजन की बात कही है। इस मसले पर कुछ हद तक उन्होंने काम भी कर लिया है। वे इस दिशा में किस हद तक सफल हो पाते हैं, यह भविष्य बतायेगा। घाटे के छोटे बजट वाली राज्य सरकारों की अपनी हदें और विवशताएं होती हैं, तिस पर आज की स्थिति में केंद्र सरकार भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है। राज्य में अतिरिक्त रोजगार सृजन के अलावा भी बड़ी-बड़ी समस्याएं होती हैं। यह विषम परिस्थिति है। अभी तो लाक डाउन के प्रभाव को कम करने के लिए सरकार की ओर से खाद्यान्न और आबादी के एक बड़े हिस्से को सामाजिक सुरक्षा के तहत कुछ धन राशि भी मुहैया करायी जा रही है, लेकिन यह ज्वार थमने के बाद क्या होगा, इस पर गंभीर मंथन की जरूरत है। लाक डाउन के कारण जिन-जिन क्षेत्रों में अतिरिक्त श्रम शक्ति की आवक हुई, उसके लिए यदि रोजगार की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित न हो सकी तो निश्चय ही उन-उन इलाकों में श्रम सस्ता हो जाएगा। एक गंभीर प्रश्न स्थानीय स्तर पर बढ़नेवाली बेरोजगारी भी तो है।

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पापी पेट के सवाल हल करने के लिए कामगारों को कुछ न कुछ तो करना ही होगा। यह परिस्थिति उन्हें श्रम के कम मूल्य पर समझौते को विवश करेगी। पूरे समाज के समक्ष जब आर्थिक स्थिति अपनी विकरालता के साथ खड़ी है तो निश्चय ही रोजगार के कम अवसरों का सृजन होगा। मांग और आपूर्ति का सीधा समीकरण है, श्रमिक अधिक हों और रोजगार कम तो श्रम को सस्ता होना ही होना है। दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह भी कि ये कामगार दूसरे राज्यों में काम कर अपने राज्य की अर्थव्यवस्था में भागीदारी निभा रहे थे। कहने की बात नहीं कि उनकी अपने कार्य क्षेत्र में होनेवाली कमाई स्थानीय रोजगार से कहीं अधिक थी। उस कमाई का एक बड़ा हिस्सा वे अपने घर-परिवार के लिए भेजकर निवेश करते थे, जो राज्य के एसजीडीपी में, चाहे जिस अंश में सही, योगदान तो करता ही था। वह बंद हो जाने पर राज्य की अर्थव्यवस्था को सीधा नुकसान होगा।

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दूसरी ओर, औद्योगिक-व्यापारिक क्लस्टर क्षेत्रों से कामगारों के पलायन के कारण नियोक्ताओं के समक्ष श्रम शक्ति का प्रश्न खड़ा हो जाएगा। शायद इसी स्थिति को भांपते हुए कुछ राज्यों ने कामगारों की देस वापसी का विरोध किया था। उन इलाकों में औद्योगिक-व्यापारिक और निर्माण गतिविधियां बहाल होते ही कामगारों की जरूरत पड़ेगी। कामगारों की संख्या कम होने पर काम के घंटे बढ़ाने की नौबत आन पड़ेगी। लंबे अरसे से आर्थिक बदहाली झेल रहे कामगार इस स्थिति का विरोध करने की मानसिकता में नहीं आ पाएंगे। एक तरह से यह बंधुआगिरी को प्रोत्साहित करेगा। इसमें स्थानीय प्रशासन शायद ही बहुत हस्तक्षेप कर पाये।

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चीन ने भारत सहित दुनिया को अत्यंत भयावह कोरोना संक्रमण देकर विषम परिस्थिति में डाल दिया लेकिन इसी चीन की अर्थव्यवस्था जब महाबली अमेरिका के लिए चुनौती बनने की ओर बढ़ रही थी, तो विश्व को पुराने सिद्धांतों पर सोचने के लिए विवश कर दिया था कि बढ़ती मानव शक्ति किसी भी देश-समाज के लिए एसेट ही होती है। अब जबकि उत्पादकता को एक बार पुनः पटरी पर लाने की चुनौती आ खड़ी हुई है तो आर्थिक विशेषज्ञों के समक्ष  मानव शक्ति के सिद्धांत पर मंथन करने का अवसर मुंह बाये खड़ा हो गया है।

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