कोरोना कहर के इस दौर में अब पहली चिंता मौत नहीं, पेट है

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कोरोना की पहुंच पेट के बाहर तक ही नहीं रही, पैठ अंदर तक हो गई है। कोरोना साथ लिए आ रहे हैं शिशु। ऐसे में सहज सवाल- कौन है कोरोना से सुरक्षित? पढ़िए, कोरोना डायरी की इक्कीसवीं किस्त वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष मानव की कलम से।
कोरोना की पहुंच पेट के बाहर तक ही नहीं रही, पैठ अंदर तक हो गई है। कोरोना साथ लिए आ रहे हैं शिशु। ऐसे में सहज सवाल- कौन है कोरोना से सुरक्षित? पढ़िए, कोरोना डायरी की इक्कीसवीं किस्त वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष मानव की कलम से।

कोरोना कहर के इस दौर में अब पहली चिंता मौत नहीं पेट है। करोड़ों सड़क पर आ चुके हैं, लाखों आने वाले हैं। जैसे-जैसे जेब खाली होगी, समस्या बढ़ती जाएगी। ऐसे में रतन टाटा और जैक मा के नाम से जारी वायरल संदेश सच है कि 2020 सिर्फ जीने के संधर्ष का साल होगा। हालांकि टाटा साफ-साफ कह चुके हैं कि उन्होंने ऐसा कोई संदेश जारी नहीं किया है। पढ़ें, वरिष्ठ पत्रकार संतोष मानव की कोरोना डायरी की 16 वीं कड़ी 

डा. संतोष मानव

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पांच-सात दिन पहले इसी कोरोना डायरी में लिखा था कि हमें कोरोना के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। यह लंबे समय तक रहेगा। अब यही स्वर केंद्र के अनेक  मंत्रियों के हैं। वे साफ-साफ कह रहे हैं कि कोरोना के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी एक न्यूज चैनल से यही कह रहे थे। अब पहले वाला- कोरोना को हराना है, का उत्साह गायब है। हिदायतें और चिंता की रेखाएं हैं। खैर, हमें कम से कम तीन बातें जीने के लिए अनिवार्य करनी होगी- सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और बार-बार हाथ धोना। मंत्रियों की बात से यह भी साफ है कि लाक डाउन पार्ट फोर नहीं होगा। उनकी चिंता के केंद्र में अब बीमारी-वायरस नहीं, डूबती अर्थव्यवस्था है। ऐसे में कुछ छूट मिल चुकी है। धीरे-धीरे बाकी चीजें भी खोल दी जाएंगी।

अब मौत की चिंता कम और पेट की ज्यादा है। यह चिंता सभी स्तरों पर है- व्यक्ति, परिवार, समाज और सरकार। काम-धंधा चौपट हो चुका है। असंगठित क्षेत्रों के तीस-बत्तीस करोड़ लोग सड़क पर हैं और कथित संगठित क्षेत्रों के आठ-दस करोड़ लोगों के सिर हमेशा छंटनी की तलवार लटक रही है। केंद्र-राज्य की  सरकारें भी नौकरी नहीं देने जा रही है। ये तो सेवानिवृत्त लोगों से खाली स्थान भी नहीं भर पातीं। उत्तर प्रदेश की सरकार ने नौकरी के लिए आयोजित सारी प्रतियोगिता परीक्षाएं टाल दी हैं। यानी जीविकोपार्जन अब सबसे बड़ी समस्या होगी। मौत के साथ-साथ यह बड़ा संकट भी कोरोना की ही देन है। और यह संकट किसी एक देश के लिए नहीं है। यह पूरी दुनिया का संकट है- कम या ज्यादा।

कम या ज्यादा का प्रश्न इसलिए कि विकसित देश कोरोना से ज्यादा पीड़ित हैं। मौत और बीमारों की संख्या पर एक नजर डालें, तो सबसे ज्यादा मौत वाले देश हैं- अमेरिका, इंग्लैंड, इटली, स्पेन और फ्रांस। इसमें कोई भी गरीब देश नहीं है। अपने देश में सर्वाधिक पीड़ित राज्य हैं- महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली। इसमें कोई भी बीमारू राज्य नहीं है। शहरों में मुंबई, अहमदाबाद, पुणे, इंदौर जैसे बड़े शहर। लेकिन, ग्लोबल विलेज के इस दौर में संकट भी देश की सीमा से परे ग्लोबल प्राब्लम या क्राइसिस हो जाती है। जो स्थितियां हैं, उसमें पूरे देश में सोशल मीडिया पर रतन टाटा के नाम से वायरल यह संदेश बिल्कुल सच है कि 2020 सिर्फ जीने के संधर्ष का साल है। इस वर्ष तरक्की, ग्रोथ की बात नहीं सोचनी चाहिए।

एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने नौकरी संकट पर कवर स्टोरी की है। उसके आंकडे चौकाने वाले हैं। एविएशन सेक्टर की 60 हजार नौकरियों में से 25 हजार चली जाएंगी। सबसे बड़ा आघात पर्यटन और रीयल स्टेट सेक्टर पर होने जा रहा है। पर्यटन की 4 करोड़ 27 लाख नौकरियों में से 3 करोड़ 80 लाख और रीयल स्टेट की 5 करोड़ 2 लाख में से 4 करोड़ 1 लाख नौकरियों पर खतरा है। यह सच भी है, क्योंकि जहां पेट की चिंता हो, वहां पर्यटन और बड़ी खरीदारी नहीं होती। पर्यटन और रीयल स्टेट की तरह आटो सेक्टर भी खतरे में है।  सोचिए, कितना बड़ा संकट है। इस संकट से कोई अछूता नहीं है। खतरा तो सरकारों पर भी है- अराजकता का खतरा।

ये सारी बातें इसलिए कि नौकरियां जाने लगी हैं। सुबह-सुबह आए फोन संदेश में भी यही सब था- कहां जा रही, किस-किस की गई?  सुबह की शुरुआत ऐसी हुई कि दोपहर बाद तक रोजगार का सवाल चिंतन का मुख्य विषय रहा। चिंतन में व्यवधान तब आया, जब बताया गया कि आनलाइन डिलेवरी वाले ने समय-सीमा बीत जाने के बाद भी सामान नहीं भेजा है। छूट के बावजूद बड़ी दुकानें बंद हैं। हां, एप से डिमांड पर डिलेवरी चार्ज लगाकर सामान भेज रहे हैं। रेट पूर्व की तुलना में तीस-चालीस फीसद ज्यादा, डिलेवरी चार्ज और समय पर आपूर्ति नहीं। टेलीफोन नंबर हमेशा व्यस्त। अब कोरोना हो या न हो, घर से निकलना पड़ेगा। शिकायत के दो दिन बाद भी सामान पहुंच जाए, तो गनीमत।

घर से निकलते ही थोड़ी दूर चलने पर देखा कि सड़कों का सन्नाटा अब टूट रहा है। दस-बीस लोग, दो-चार गाड़ियां दिख गईं। दिखा यह भी कि लोग पास आने से कतराते हैं। नए किस्म की अश्पृश्यता! कोरोना वायरस का असर। लोग बात करेंगे दूर से। पेन भी पकड़ाएंगे ऐसे कि जैसे सामने वाले में करंट हो। चलो, ठीक ही है, लोग सावधान तो हैं। पुलिस का डर भी है। दूध की दुकान पर ऐसा महसूस हुआ- भैया सात बजने में  सिर्फ छह मिनट बचे हैं। चलो, यह भी अच्छा है।

व्यक्ति : बंदी का 46 वां दिन। इन 46 दिनों में दिल्ली से अमूमन रोज एक वीडियो वायरल होता है। इसमें दो व्यक्ति दुकानों-मकानों को सेनीटाइज करते दिखते हैं। कहते हैं कि अपने पटेल नगर को कोरोना मुक्त करना है। इसमें शामिल हैं आम आदमी पार्टी के पदाधिकारी अंकुश नारंग। रोज पीठ पर छोटी-सी मशीन लादकर मकान-दुकान सेनीटाइजेशन। ऐसा कम होता है। भावना चाहे जो हो, अच्छी ही कही जाएगी।

और अंत में: कोरोना कंटेंमेंट जोन के लिए एक शब्द चल पड़ा है- कोरोना गली। शब्द ठीक है। लेकिन, यह शब्द किसी इलाके के लिए स्थायी न हो, इसका ख्याल रखना होगा। बदनाम से क्यों जुड़े किसी का नाम?

(लेखक राज एक्सप्रेस व दैनिक भास्कर के संपादक रह चुके हैं)

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