कोयल, बसंत में अब तुम्हारे कूकने का बेसब्री से इंतज़ार है !

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कोयल का आवाज में बसंत गाता है। सरसों के पीले फूलों की गंध से बसंत महकता है। आम के मंजर की मादक गंध किसे न भाती।
कोयल का आवाज में बसंत गाता है। सरसों के पीले फूलों की गंध से बसंत महकता है। आम के मंजर की मादक गंध किसे न भाती।

कोयल का आवाज में बसंत गाता है। सरसों के पीले फूलों की गंध से बसंत महकता है। आम के मंजर की मादक गंध किसे न भाती। बसंत के आगमन पर विस्तार से बता रहे ध्रुव गुप्त।

  • ध्रुव गुप्त

वसंत का रंग सरसो के फूलों का रंग है। आम के नए मंजर की नशीली गंध  वसंत की गंध है। कोयल की आवाज में वसंत गाता है। सरसो के फूल और आम के मंजर तो हमने देख लिए, अब इंतज़ार कोयल के गीतों का है। उनके आने के साथ वसंत अपना पूर्णत्व प्राप्त कर लेगा।

अपने मधुर गीतों के लिए कोयल भारतीय काव्य का सबसे दुलारा पक्षी रहा है। वसंत में इसकी कूक प्रणय की इच्छा और विरह की पीड़ा दोनों जगाती है। कोयल के गीत मार्च से अगस्त के बीच सुने जाते हैं। नर और मादा कोयलों के गीत अलग-अलग होते हैं। नर कोयल के गाने का उद्देश्य मादा कोयल को अपनी तरफ आकर्षित करना होता है।

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अगर इनका गायन कुछ लंबा चला तो समझा जाता है कि वे कठोर-हृदय मादाओं को लुभाने का जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं। उनके गायन का दूसरा मक़सद अपने अधिकार-क्षेत्र को दूसरे नर कोयलों से सुरक्षित करना भी होता है। मादा पर कब्जे के लिए नरों के बीच गाने की होड़ तब तक चलती है, जब तक उनमें एक के सिवा बाकी थक कर मैदान न छोड़ दें। मादा कोयलों को अपने गीतों से नरों को रिझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे केवल अपनी प्रसन्नता और उल्लास व्यक्त करने के लिए ही गाती हैं।

हमारे संगीत संस्कारों के सर्वाधिक निकट होने के कारण यह पक्षी सभ्यता के आरंभ से ही हमारे दिलों के बहुत पास रहा है। इसके होने से हमारे आसपास ही नहीं, हमारी संवेदनाओं में भी संगीत बजता है। इस जटिल और यांत्रिक होते समय में वे हमारे लिए सहज अनुराग का भरोसा बने हुए हैं। अभी आम के पेड़ हाथों में नशीले मंजरों के गुलदस्ते लिए कोयल की आकुल प्रतीक्षा में खड़े हैं। प्रतीक्षा हमें भी है। आओ न कोयल, सौंदर्य, गंध और सुरों के इस बासंती उत्सव में कुछ दूर तक हमें भी अपने साथ ले चलो।

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