कुमार जगदलवी की कविता- लड़ो या मरो………

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  • कुमार जगदलवी

सामने खतरा था

मैं उससे लड़ सकता था

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मगर ज़ेहन ने कहा

काहे को लड़ना

लड़ने पर जोखिम है

बेहतर है कि

मैं रास्ता बदल लूं

मैंने रास्ता बदल लिया

आगे कुछ दूर चलने पर

कहीं से कोई एक हरकत हुई

दिमाग चौकन्ना हुआ

दिल ने फिर कहा

बढ़ने की सोच मत !

आगे खतरा है

बेहतर है रास्ता बदल ले।

 

मैं फिर तीसरे रास्ते को मुड़ गया

अभी कुछ ही दूर चला था कि

एक बार फिर से मेरे कानों में

एक सरगोशी हुई

दिमाग ने कहा- सावधान! खतरा है।

इस बार जेहन ने थोड़ी हिम्मत दी

मुझसे कहा-

सामना कर,

हो सकता है

तू उस पर काबू पा ले।

मगर दिल ने अंदर से कहा

बेवकूफ़!

काहे को लफड़ा पालना ?

जल्दी से रास्ता बदल

चौथा रास्ता ठीक रहेगा।

मैंने झट से उस रास्ते को पकड़ लिया

अब मैं खुद को सुरक्षित मान रहा था

कुछ बेफिक्री भी आ गई थी

और, आगे बढ़ चला।

मगर यह क्या?

सामने देखा तो

जिस खतरे का अभी तक

सिर्फ अंदेशा था,

मैंने जिससे बचने के लिए

चार रास्ते बदल लिए थे

वह खतरा

सचमुच मेरे सामने था।

परंतु अब मेरे सामने

बच निकलने के लिए पांचवां

रास्ता नहीं था।

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