उपेंद्र कुशवाहा व जीतनराम मांझी न घर के, न घाट के

0
194
उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी की हालत इनदिनों गजब की हो गयी है। सीधे तौर पर कहें कि हालत ठीक उस तरह की हो गयी है, जैसे ये न घर का रहे और घाट के।
उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी की हालत इनदिनों गजब की हो गयी है। सीधे तौर पर कहें कि हालत ठीक उस तरह की हो गयी है, जैसे ये न घर का रहे और घाट के।
  • संजय वर्मा
संजय वर्मा
संजय वर्मा

उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी की हालत इनदिनों गजब की हो गयी है। सीधे तौर पर कहें कि हालत ठीक उस तरह की हो गयी है, जैसे ये न घर का रहे और घाट के। आरजेडी से दुत्कारे जाने के बाद दोनों नये ठौर की तलाश में कभी इस दरवाजे तो कभी उस दरवाजे घूमते फिर रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा के बारे में खबर है कि वे कांग्रेस के करीब जाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई बात नहीं बनी है। सूचना तो यह है कि कांग्रेस उन्हें विलय करने के लिए कह रही है। जीतनराम मांझी तो आरजेडी नेतृतत्व को धमकी-हुमकी देने के बाद अब अपने पुराने घर यानी जेडीयू से सटने की तैयारी में हैं। आरजेडी ने इन दोनों नेताओं को साफ-साफ कह दिया है कि उनकी शर्तों पर और उनके अंदाज में चलना संभव नहीं।

कुछ दिनों पहले तक आरजेडी पर दबाव बनाने के लिए वीआईपी के मुकेश सहनी, हम (से) के जीतनराम मांझी और आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा गुटबंदी करते रहे। आरजेडी नेतृत्व को धमकी देते रहे। कभी कांग्रेस नेताओं से मिलते तो अकेले बैठक करते। हाल ही में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने साफ कर दिया कि इन नेताओं को कोई भी बात करनी है तो उन्हें प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह से बात करनी होगी। इसके बाद तीनों नेताओं की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी है। माझी तो हड़बड़ी में नीतीश से मिलने-जुलने भी लगे हैं। समझा जाता है कि एनडीए के घटक दल लोक जनशक्ति पार्टी के नेता जिस तरह नीतीश कुमार को जलील करते रहे हैं, उन्हें औकात बताने के लिए नीतीश कुमार भी माझी को अपनाने के लिए तैयार हैं। लेकिन एक शर्त उन्होंने थोप दी है कि हम (से) का जेडीयू में विलय कर दें।

- Advertisement -

विलय की ही शर्त कांग्रेस ने आरएलएसपी नेता उपेंद्र कुशवाहा के सामने भी रखी है। कुशवाहा की दिक्कत है कि जिन स्वजातीय वोटों को लेकर वे मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देखते रहे हैं और नीतीश कुमार से खुद को कमतर नहीं मानते, विलय के बाद उनका यह हक खत्म हो जाएगा। लेकिन हालात जो बन रहे हैं, उसमें नहीं लगता कि कांग्रेस अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार होगी।

दरअसल माझी, कुशवाहा और मुकेश सहनी स्टेयरिंग कमिटी बनाने की मांग लगातार कर रहे थे। लेकिन आरजेडी ने साफ इनकार कर दिया। उल्टे में तेजस्वी ने माझी को नसीहत दे डाली कि महागठबंधन के बारे में कोई भी बात करनी हो तो प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह से मिलें। इस पर तिलमिलाये माझी ने यहां तक कह दिया कि जगदानंद से उनकी पार्टी का प्रखंड अध्यक्ष बात करेगा। यानी अब यह साफ हो गया है कि आरजेडी महागठबन्धन के घटक दलों को अपने इशारे पर नजायेगा। संदेश साफ है- नाचिए, नहीं तो बाहर का दरवाजा खुला है।

तेजस्वी यादव, लालू यादव या उनके परिवार का कोई सदस्य घटक दलों से बात नहीं करेगा। इसके लिए पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष जगदानन्द सिंह को अधिकृत कर दिया है। कांग्रेस ने भी इस मामले में एक तरह से टांग अड़ाना मुनासिब नहीं समझा है। सीधे कहें तो जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा दोनो को उनकी अपनी औकात बता दी गयी है। अब इनकी हालत यह है कि बड़े बेआबरू होके तेरे कूचे से निकले हम। हम सुप्रीमो पूर्व सीएम जीतनराम मांझी के अल्टीमेटम की मियाद भी खत्म हो गयी है। अब सवाल है मांझी करेंगे क्या। यू टर्न लेकर, जलील होकर, सम्मान से समझौता कर वे राजद के साथ रहेंगे या स्वाभिमान की खातिर कोई बड़ा स्टैंड लेंगे। भाजपा में वे जा सकते थे, पर सूचना है कि इसके लिये भाजपा तैयार नहीं है। जेडीयू में जाएंगे तो वहां भी नीतीश कुमार ने उन्हें निपटाने की मुद्रा में शर्त रख दी है कि अलायंस नहीं, अपनी पार्टी का पूरा विलय कीजिए। यानी आगे कुआं, पीछे खाई। इसके अलावा कोई विकल्प भी नही है।

यह भी पढ़ेंः आरक्षण का जिन्न फिर बोतल से बाहर, बिहार में मचेगा घमासान

अब बात रालोसपा सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा की। उनके साथ भी राजद मांझी जैसे वर्ताव पर उतारू है। ऐसे में सवाल उठता है वे क्या करेंगे, उनका क्या स्टैंड होगा। जदयू-भाजपा से अलायंस की संभावना तो दूर-दूर तक नहीं। वर्तमान परिस्थितियों में राजद के साथ अब रहने का मतलब अपने पैर पर कुदाल मारना है। कांग्रेस ही उनके लिए सुरक्षित ठिकाना हो सकती है। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। राजनीतिक गलियारे की सूचनाओं पर भरोसा करें तो नीतीश की तरह कांग्रेस भी उपेंद्र को निपटाना चाहती है। उसने भी प्रस्ताव दिया है कि अपनी पार्टी रालोसपा का विलय कांग्रेस में कर लें। बाकी जिन्हें टिकट देना है, उन्हें देंगे। आपकी भूमिका राष्ट्रीय स्तर पर तय की जाएगी। मतलब मांझी और उपेंद्र दोनो ही मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं। दोनो के लिये न निगलते बन रहा और न उगलते।

यह भी पढ़ेंः भारत-चीन सैन्य झड़प: अतीत के आईने और भविष्य के मायने

- Advertisement -