अशोक वाजपेयी ने न सिर्फ संस्थाएं खड़ी कीं, बल्कि खुद में एक संस्था थे

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अशोक वाजपेयी ने न सिर्फ संस्थाएं खड़ी कीं, बल्कि वे खुद में एक संस्था थे। बहुलता को बचाने और बढ़ाने का निरंतर यत्न किया। विस्तार से बता रहे हैं कृपाशंकर चौबे
अशोक वाजपेयी ने न सिर्फ संस्थाएं खड़ी कीं, बल्कि वे खुद में एक संस्था थे। बहुलता को बचाने और बढ़ाने का निरंतर यत्न किया। विस्तार से बता रहे हैं कृपाशंकर चौबे

अशोक वाजपेयी ने न सिर्फ संस्थाएं खड़ी कीं, बल्कि वे खुद में एक संस्था थे। बहुलता को बचाने और बढ़ाने का निरंतर यत्न किया। विस्तार से बता रहे हैं कृपाशंकर चौबे

  • कृपाशंकर चौबे
कृपाशंकर चौबे
कृपाशंकर चौबे

अशोक वाजपेयी आज ही के दिन 1941 को दुर्ग में जन्मे। अशोक वाजपेयी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे, किंतु भारत और भारत के बाहर उनकी पहचान कवि, समीक्षक और कला-संस्कृति के अध्येता के रूप में बनी। साहित्य-कला-संस्कृति की मेधाओं का सम्मान करने तथा उन्हें प्रोत्साहित करने में अशोक जी का कोई जोड़ नहीं है। ‘जनसत्ता’ के कभी-कभार स्तंभ में उन्होंने अनेक अविज्ञापित व्यक्तियों पर कलम चलाई तो व्योमेश शुक्ल जैसे चर्चित युवा कवि पर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखा। ऐसे कई उदाहरण हैं। स्वयं संस्था बनने के बाद अशोक जी ने कई संस्थाओं को बनाया।

भोपाल में भारत भवन जैसे सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना में महती भूमिका निभानेवाले अशोक जी का रजा फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी के रूप में कितना बड़ा रचनात्मक अवदान है, इसका सहज अंदाजा केवल वहां से प्रकाशित किताबों को ही देख-पढ़कर लगाया जा सकता है। एक और संस्था के स्थापना काल से ही उनका नाम जुड़ा है। अशोक जी 29 दिसंबर 1997 को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति बने थे और 1998 में विश्वविद्यालय की अवधारणा पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा में संगोष्ठी की थी जिसमें विश्वविद्यालय की पहली कार्य परिषद के सदस्य विद्यानिवास मिश्र और विष्णुकांत शास्त्री ने भी भाग लिया था। विश्वविद्यालय के ध्येय का निश्चय करते हुए विद्या के चार पीठों-भाषा, साहित्य, संस्कृति और अनुवाद की संकल्पना की गई। चारों विद्यापीठों के स्वरूप और पाठ्यक्रम निर्धारण के लिए अशोक वाजपेयी ने 1998-99 में देशव्यापी परामर्श चलाया।

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भाषा विद्यापीठ का दायित्व भाषा को सर्वांग संपन्न बनाने के लिए हिंदी भाषा का उसके समस्त आयामों में अध्ययन, व्याकरण, कोश निर्माण, जनपदीय भाषाओं का कॉर्पस तैयार करना, भाषा प्रौद्योगिकी का विकास, हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के परस्पर संबंधों का अध्ययन, भारतीय एवं विदेशी भाषाओं का हिंदी माध्यम से शिक्षण सुनिश्चित करना था। साहित्य विद्यापीठ का कर्त्तव्य विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य की सापेक्षता में हिंदी साहित्य का अध्ययन यानी तुलनात्मक भारतीय साहित्य की संकल्पना का विकास करना, विश्व साहित्य से परिचय, हिंदी के लोक साहित्य का सर्वेक्षण, संग्रह और अध्ययन, साहित्य और अभिव्यक्ति के नए-पुराने माध्यमों में अंतर्संबंध का अध्ययन; अतः साहित्य और भारतीय साहित्य की आवयविक अवधारणा का निर्माण-विकास करना था। संस्कृति विद्यापीठ का उद्देश्य परंपरा प्राप्त ज्ञान व विमर्श का अनुशीलन करना था जिसमें सिनेमा, मीडिया, डायस्पोरा, जेंडर, दलित, आदिवासी एवं मानवशास्त्रीय अध्ययन शामिल थे। अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ का दायित्व भाषाओं-साहित्यों और ज्ञानानुशासनों के बीच सेतु का निर्माण करना था ताकि भाषाओं के बीच साझेदारी और समझदारी बढ़े और दुनिया भर से संवाद और हिंदी में मौलिक ज्ञान एवं ग्रंथों का निर्माण हो सके। इस तरह हिंदी का क्षितिज विस्तार करना विश्वविद्यालय का ध्येय था।

देशव्यापी परामर्श के बाद अशोक वाजपेयी ने चारों विद्यापीठों के लिए पाठ्यक्रम निर्माण समितियों का गठन किया। पाठ्यक्रम बनने के बाद 2002 में साहित्य और अहिंसा में एमए में प्रवेश प्रारंभ हुआ। प्रवेशार्थियों से पूछा गया था कि वे इस पाठ्यक्रम में क्यों प्रवेश लेना चाहते हैं। सही जवाब देनेवाले प्रवेशार्थियों को वर्धा बुलाया गया। सीटों की संख्या से तिगुना अधिक प्रवेशार्थी थे। उन्हें फिल्म दिखाई गई, उस पर बहस हुई। बहस में कई विद्यार्थी छंट गए। जिन्हें प्रवेश मिला, उनकी अशोक वाजपेयी ने दो दिन कक्षाएं लीं। उन्होंने विश्व साहित्य पढ़ाया था। अशोक जी ने व्याख्याताओं के लिए पुनश्चर्या और कार्यशालाओं के आयोजन किए, व्याख्यानमालाएं और शोध परियोजनाएं शुरू कराईं, हिंदी साहित्यकारों के छवि संग्रह तथा काव्य आवृत्ति के कैसेट कविता शती निकलवाई।

अशोक वाजपेयी ने विश्वविद्यालय की द्विमासिक ‘पुस्तक वार्ता’ और त्रैमासिक पत्रिका ‘बहुवचन’ निकाली जिसकी समूचे हिंदी जगत में धूम मच गई। ‘बहुवचन’ का हर अंक एक ग्रंथ की तरह निकला। उसका लोग इंतजार करते थे। उसकी वजह समृद्ध सामग्री थी। उदाहरण के लिए ‘बहुवचन’ के प्रवेशांक की चर्चा करें तो वह अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर 1999 में आया था जिसमें चार पीढ़ियों के उपन्यासकारों के नए उपन्यासों के अंश छपे थे तो कविता में प्राचीन, मध्यकालीन, आधुनिक और समकालीन सभी पक्षों को लिया गया था। अपनी परम्परा के लुप्त रूप टीका को पुनर्जीवित करते हुए वागीश शुक्ल ने निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ के एक अंश पर विशद टीका की थी तो दार्शनिक यशदेव शल्य ने काव्य-तत्त्व पर और साहित्यकार नन्द किशोर आचार्य ने साहित्य और ज्ञान-मीमांसा के सम्बन्ध पर और पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने भाषा और पर्यावरण के सम्बन्ध पर प्रकाश डाला था। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने इलाहाबाद की साहित्यिक दुनिया को याद किया था तो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कविता में निज की अनुपस्थिति को रेखांकित करने की चेष्टा की थी और ध्रुव शुक्ल ने गांधी को नए ढंग से प्रस्तुत किया। चित्रकार एस. हर्षवर्धन के दस रंगीन चित्र और मनु पारेख द्वारा विशेष रूप से बनाए गए रेखांकन प्रवेशांक के अलग आकर्षण थे। जैनेन्द्र कुमार और महात्मा गांधी के बीच का पत्राचार व निरालाजी की तब तक असंकलित कविता ‘राखी’ अंक की उपलब्धि थी।

अशोक वाजपेयी ने ‘बहुवचन’ की पहली संपादकीय में लिखा था, “सारी दुनिया संस्कृति, भाषा, संचार, सूचना आदि की दृष्टि से पड़ोस हो गयी है, इसी गहमागहमी से भरे पड़ोस में इस नई पत्रिका को अपने लिए थोड़ी सी जगह खोजनी है। एक ऐसी जगह जो खुली और रौशन हो, जिसमें उत्साह और आकांक्षा के लिए अवकाश हो, जिसमें धीरज और जतन हो, जिसमें उम्मीद और भरोसा करना सम्भव हो, जिसमें न सांसत हो, न आतंक-जो वर्चस्व और प्रभुत्व के मण्डल से बाहर हो। आज की दुनिया में हिन्दी के लिए ऐसी जगह हो सकती है और उसे खोजने-पाने के लिए ईमानदार और लगातार कोशिश की जा सकती है- यह विश्वास ‘बहुवचन’ का मूलाधार है।”

‘आरम्भिक’ शीर्षक उसी संपादकीय टिप्पणी में अशोक वाजपेयी ने यह भी कहा था, “सौभाग्य से संसार भले ही खगोल में एक है लेकिन अपने अस्तित्व में अपनी हजारों भाषाओं, असंख्य परम्पराओं, असीमित पद्धतियों और सरणियों में, मनुष्यता की आत्यन्तिक बहुलता में बहुवचन है। मनुष्यता का बुनियादी तर्क ही उसकी बहुवाचकता से निकलता है। यह भी कहा जा सकता है कि संसार कई तरह से और कई रूपों में बहुवचन का उत्सव है, अपनी ही बहुवाचकता का अनुष्ठान है। स्वयं हिन्दी भाषा एक अकेली भाषा न होकर दरअसल एक भाषा परिवार है। उसका अनेक बोलियों का, जिनमें से एक खड़ी बोली अब उसका मुख्य माध्यम बन गयी है,  समुच्चय होना उसे अपनी प्रकृति और परम्परा, अपने दर्शन और अनुभव में बहुवचन बनाता है। उसका औचित्य निरी संख्या का नहीं है, बल्कि इस बहुवाचकता का है, वह बहुवचन है क्योंकि हिन्दी इतनी सारी बोलियों में बोलती है और संवेदना-अनुभव-दृष्टि का एक ऐसा भूगोल विन्यस्त करती है जो अर्थ, कर्म और शैली में अपार बहुलता से भरा-पूरा है।” कहने की आवश्यकता नहीं कि उस बहुलता को बचाने और बढ़ाने का निरंतर यत्न अशोक जी ने किया है। अशोक जी को जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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