अवसाद और आत्महत्या के बहाने एक इंटर्न लड़की की दिलचस्प कहानी

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अवसाद और आत्महत्या के बहाने एक इंटर्न लड़की की दिलचस्प कहानी बतायी है वरिष्ठ पत्रकार उनेश चतुर्वेदी ने। लिखा है
अवसाद और आत्महत्या के बहाने एक इंटर्न लड़की की दिलचस्प कहानी बतायी है वरिष्ठ पत्रकार उनेश चतुर्वेदी ने। लिखा है
  • उमेश चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी

अवसाद और आत्महत्या के बहाने एक इंटर्न लड़की की दिलचस्प कहानी बतायी है वरिष्ठ पत्रकार उनेश चतुर्वेदी ने। लिखा है- कुछ साल पहले की बात है। जिस टीवी चैनल में काम कर रहा था, वहां इंटर्नशिप करने एक बेहद जहीन लड़की आई। आमतौर पर मैंने देखा है कि नई पीढ़ी वाले पत्रकारों का हाथ लिखने में तंग है, लेकिन वह लिख भी बढ़िया लेती थी और जो काम इंटर्न से आमतौर पर कराए जाते हैं- बाइट-विजुअल कटवाना..आदि, वह भी कुशलता से कर देती थी। जो लिखना जानते हैं, उनके प्रति मेरे मन में कुछ ज्यादा ही आदर होता है, तो उसके प्रति भी हो गया था। इंटर्नशिप के दूसरे ही हफ्ते वह फेसबुक फ्रेंड बन गई। करीब तीन हफ्ते बाद की बात है।

मेरे किसी परिचित का देहांत हुआ था। नींद उचटी हुई थी। नींद आंख से कोसों दूर थी, लिहाजा फोन लेकर मैं बालकनी में जा बैठा। ऐसे वक्त में सोशल मीडिया पर गुजरने लगा। अचानक एक पोस्ट पर निगाह पड़ी। लिखा था- ‘सब कुछ खत्म हो गया।’ पोस्ट उसी लड़की का था, जो हमारे साथ इंटर्नशिप कर रही थी। दो-तीन दिनों से दफ्तर नहीं आ रही थी। इसकी जानकारी उसने मैसेज करके दे भी दी थी।

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मैं इंटर्न की छुट्टी लेने आदि पर ध्यान नहीं देता। कौन उन्हें तनख्वाह मिलती है कि उनके छुट्टी लेने पर सवाल-जवाब करें। वैसे भी जब मैंने इंटर्नशिप की थी, तब मेरे डेस्क इंचार्ज Ramendra Kumar Sinha जी जैसे लोग मिले थे। आज के टीवी चैनलों के संपादकों की तरह डांटते-फटकारते नहीं थे। उल्टे वे खिलाते-पिलाते ही थे। यह बात और है कि मुझे अनुवाद सीखना था, इसलिए मैंने पूरे इंटर्नशिप के दौरान छुट्टी नहीं ली थी।

पोस्ट पढ़कर मैं आशंकित हो गया था। मैंने उसे मैसेज भेज पूछा- क्या हुआ। उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने दोबारा मैसेज भेजा तो जवाब आया- सबकुछ खत्म और अब मैं भी जा रही हूं। मेरा डरना स्वाभाविक भी था। मैंने उसे फोन लगा दिया। वह अपनी बालकनी में थी। शुक्र है, उसने फोन उठा लिया। दूसरी तरफ सन्नाटा था।

मैंने उससे पूछा- क्या हुआ, बताओ। वैसे भी वह इतनी दूर रहती थी कि उसके पास देर रात को जाना आसान भी नहीं था। हालांकि हमारे कुछ साथी वह जहां रहती थी, उसके पास रहते थे। मैंने मन बना लिया कि उन्हें जगाउंगा। हालांकि मैंने उसे फोन पर व्यस्त रखा। उससे पूछता रहा। कुछ देर में वह फूट पड़ी। पता चला कि उसके माता-पिता अलग होने का फैसला ले चुके हैं। और वह इसके बाद के हालात को सोच टूट चुकी थी।

वैसे तो दिल्ली की रातें नि:शब्द तो होती नहीं, दो-ढाई दशक पहले तक भले ही होती हों। बहरहाल मेरे फोन से उसका ध्यान बंटा, वह रोती रही। जब लगा कि वह फिर बात सुन सकती है, मैंने उससे किचेन में जाकर एक गिलास पानी पीने को बोला। मैंने फोन नहीं काटा। मुझे फोन पर भरोसा हो गया कि उसने पानी पी लिया है।

मैंने उसे सुझाव दिया कि अभी जाकर सो जाए। नींद न आ रही तो कुछ सुने। जिस देवी-देवता में उसकी आस्था हो, उनका नाम ले। मैंने उसकी जमकर बड़ाई की। उसके लिखने-काम करने को याद किया। उसकी लेखन शैली की प्रशंसा की। फिर मैंने उससे वादा लिया कि वह दोबारा आत्महत्या के बारे में नहीं सोचेगी। और दफ्तर में मिलने का वादा लिया।

दो दिन बाद वह दफ्तर आई। सुबह की शिफ्ट का मैं प्रभारी था। आते ही उसने मुझसे सिर्फ तीन शब्द कहे- थैंक यू सर। और अपने काम में जुट गई। मेरे एक-दो साथियों ने थैंक्स की वजह पूछी। मैंने नहीं बताया। बहरहाल वह एक अच्छे संस्थान में काम कर रही है और खुशहाल जीवन जी रही है।

यह अनुभव साझा करने का मकसद सिर्फ इतना बताना है कि जब भी लगे कि आपका कोई परिचित, साथी, दोस्त, सहकर्मी टूट रहा है, यह आभास कराने में देर न लगाएं कि आप उसके साथ हैं। सिर्फ इतने में ही ध्यान बंट जाता है, आत्महत्या का विचार भी मुल्तवी होने लगता है।

मेरे गांव में करीब एक दशक पहले एक सज्जन पारिवारिक कलह के चलते शाम की ट्रेन के सामने कूदने जा पहुंचे। उनकी गतिविधियों को संदेहास्पद किसने पाया, जिनके साथ उनकी मुकदमेबाजी चल रही थी। बहरहाल ट्रेन आते देख वे सज्जन सक्रिय हुए और उनका दुश्मन भी। भागकर पटरियों के पास पहुंचा और उन्हें पकड़ लिया। एक जिंदगी बच गई। उसने मजाक में कहा था- आप चले जाएंगे तो मुकदमा किससे लड़ेंगे।

उदारीकरण में जिंदगी लगातार दुश्वार हुई है। पहले अभाव था, अवसाद नहीं था। अब वैसा अभाव नहीं है, जैसा दो-तीन दशक पहले था, लेकिन अवसाद जबरदस्त है। लेकिन इसी अवसाद में आगे बढ़ना है। जिंदगी से जूझना है और अगर इस जूझन में कोई टूट रहा है तो उसे भी बचाना है।

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